~वो पहला प्रपोज़ल ~

बात उन दिनों की जब मोहब्बत बस हो जाया करती थी। लगभग 12 साल पीछे चल दीजिये, तो वो दौर था जब वो स्कूल में थी, अच्छी, बहुत अच्छी स्टूडें...

बात उन दिनों की जब मोहब्बत बस हो जाया करती थी। लगभग 12 साल पीछे चल दीजिये, तो वो दौर था जब वो स्कूल में थी, अच्छी, बहुत अच्छी स्टूडेंट।

और मै लास्ट बेंच पर बैठकर बस एक ही गाना गुनगुनाता था “चाहा है तुझको, चाहूँगा हरदम ....”
सुबह-सबेरे अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ साईकल से रोजाना ट्यूशन पर जाती थी । उस दिन उसे उसकी साईकल के कैरियर पर एक फूल मिला। विशेष ध्यान न देते हुए उसे एक ओर रखा, साईकल उठायी और चली गयी घर की ओर।

दिल को थोडा सा बुरा जरुर लगा था ...! लेकिन इस सिलसिले को मै रुकने नहीं देना चाहता था !

..........गुलाब, गुड़हल, डहलिया, सूरजमुखी, यहाँ तक की कनेर क्यों न हो, पर उसकी साईकल पर रखता जरूर था।

5-7 दिन गुजर गए थे, दोस्त जी भर चिढ़ाते। नयी उम्र का नया शगल था, अच्छा लगता मुझको भी। पर वो दिन यूँ आज की तरह तो थे नहीं। इसलिए मन ही मन घबराते भी।

अब फूल स्कूल की बेंच तक उसके आने के पहले ही रख आता था.......।

उसने और उसकी दोस्त ने महसूस किया, कि अब स्कूल छूटने पर कोई पीछे-पीछे उसकी गली तक छोड़ने आता है पर पीछे मुड़ कर देख ले, ऐसा कालेजा न जुटा सकी वो .............!

अब बेचैनी का दौर आ गया था। बड़े नासाज तबियत से हम घूमते।

पढ़ाई लिखाई से दिल कब का उचट गया था। मोहब्बत छोड़िये साहब, बात पिछले ज़माने की थी। तब लड़की गेट पे भी खड़ी हो जाये तो पड़ोस की आंटियाँ आँखे ततेर के देखती थी।.......और फिर जब उसकी साईकल से थोड़ी दूर पर मै होता था तो उन आंटी लोगों का कहना ही क्या ........!

इधर काफी दिन से वो ट्यूशन और स्कूल नहीं आई थी .......... दिल बड़ा बेचैन होने लगा था ......!
खैर कब तक। फिर उसी दिनचर्या में वापस।

मुरझाये से चेहरे के साथ हम उस रोज भी साईकिल में पैडल मारते हुए जा रहे थे। ठण्ड के दिन थे। सुबह 6 बजे सड़क पर कोहरा पसरा पड़ा था।

अचानक सड़क के बीचों-बीच दुबली पतली काया आती हुई दिखाई दी ।
मै बोला, "मैं हूँ..तुमसे बात करनी है।"
उसे उसकी दोस्त ने हौसला और स्वीकृति दी।

मिनटों ख़ामोशी रही वो फिर.............
मेरी तरफ से .......

एक फूल, चंद लफ्जो में मोहब्बत की बयानबाजी, माफ़ी की दरकार और एक अदद कागज का पन्ना और फिर दोबारा न परेशान करने का आश्वासन।
वो बस नजर झुकाये ही रह गई।
सहेली की आवाज ने उसकी विचारशीलता को तोडा।

हाथ-पैर नार्मल से ज्यादा ठन्डे महसूस हुए और चाह कर भी जुबां हिली ही नहीं उसकी ।

.........मैंने भी बगैर जवाब का इंतजार किये अपना फैसला सुना दिया, कि जो भी हो तुमसे ही प्यार है और रहेगा। बाकि परेशान नहीं करूँगा अब।

दो-चार रोज बीत गए इस वाक़ये को। पर ये क्या? अब उसे भी कुछ सालने लगा। कुछ अधूरापन सा था। उसकी साईकिल की रफ़्तार कुछ धीमी हो जाती उस रोड पर। हाँ, शायद मेरा उसका पीछा करना... फूल रखना... भेजवाना... छुप के देखना... सब बहुत मिस करने लगी थी वो ........।
अचानक किसी चीज का आदत में तब्दील हो जाना। फिर अनायास ही बंद हो जाना। इस तरह से कमी शिद्दत से महसूस करवाएगा मुझे अंदाजा नहीं था।

अगले कुछ दिनों में आस-पास सब कुछ बेगाना हो चला। 'हिंदी-इंग्लिश' को तो हम हलके में ही लेते थे, 'केमिस्ट्री' कहीं उलझ गयी थी, 'बायोलॉजी' ये थी कि उसके जिक्र से ही दिल की रफ़्तार तेजी पकड़ लेती और 'फिज़िक्स' के एवज में आँखे उसकी फ़िजिक कहीं दिख जाये इसी का इन्तेजार करती।

कुल मिला कर उम्र के उस नाजुक दौर में हमारी सीधी सादी जिंदगी के सब सब्जेक्ट उसी के मार्किंग के भरोसे हो गए। अब शून्य में विचार चलते। दोस्त छेड़ते तो बड़ी अदा से मुस्कुराते और मैडम को देखते तो मुंडी नीचे। फूलों से बरसों का सानिध्य महसूस होता। और कभी कभी शाम को भी उसी ट्यूसन वाले रस्ते पे निकल लेते।.........

अचानक सलीका सीख गए थे हम दोनों ........., उसके आँखों में काजल ने जगह बना ली और कपड़ों के चॉइस और कलर भी मैटर करने लगे थे........।

स्कूल के बाद बस स्टॉप पे घंटो मुझे इल्म रहता, कि एक जोड़ी आँखे मुझे देखती होंगी।
पर वो, उसका कही पता नहीं था। और मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता था।
एग्जाम ख़त्म हो गए और .................... इस बार आलम दूसरा था।

हमारी तबियत भी आशिक़ो-सा रवैया अपनाये हुए थी इस बार। वही ट्यूसन वाला रास्ता था और सड़क किनारे कुछ झाड़ियों की ओट। घंटे भर खामोश खड़े रहे। बिना शर्त का इक खामोश रिश्ता उन दिनों जी रहे थे, हम दोनों ही।
वो दूसरी ही मुलाक़ात थी।

मेरा उसके कंधे से एक चीटीं हटाना हजारों तितलियों के लम्स जैसा हो गया था। वो पत्ते सी कांप गयी। "तुम ठीक तो हो" का एक ठहराव हमारी ख़ामोशी में आ गया था। "तुम आगे पढ़ने बाहर जा रही हो। तुम अच्छे से जाओ और पढ़ो। बस तुमसे प्यार है तुम्हारे फ्यूचर के बीच मैं नहीं आऊंगातुम्हारा जबाव भी नहीं चाहिए मुझे.........."
बहते आसुओं के बीच वो मेरी ख़ामोशी मेरे अंदर जहनी शोर मचा रही थी।

उसको भी लड़की होने का अहसास इतन सख्त था , कि शर्म और असहजता की पतली रेखा पार ही न कर सकी । उसके आंसू कुछ तो जवाब दे ही चुके थे।

पर अब तक चल दिया था, मै पीछे मुड़ कर..............

न फ़ोन का जमाना था न ईमेल का, दुनिया की भीड़ में मोहब्बत का पहला प्रपोजल खो गया।

अब वो प्रेम था या उम्र के सफ़र का इक नाजुक दौर, इसका विश्लेषण हम कभी कर ही न सके।

12 साल बीत गए पर आज भी वो खामोश तमन्नाये अंतर्मन में उतनी ही ताजगी से शोर कर जाती है। और हम बस मुस्कुरा उठते है, कि अजब दौर था... स्कूली चाहतें ऐसे ही बेमतलब पर शिद्दती अहसाह वाली होती थी।

#प्रदीप

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