“वैल आय ऍम सॉरी मिस , इट वास् नॉट माय फौल्ट. यू शुड हैव सीन प्रोपरली हियर एंड देयर व्ह्यल चैटिंग ऑन योर फ़ोन.”
“एक्सक्यूज़ मी!”
“यू आर एक्सक्यूज़ड.”
नंदिनी चौंक गई थी एक कस्बाई जगह पर इस तरह से अंग्रेजी बोलते हुए किसी लड़के को, मोबाइल फ़ोन पर चैटिंग करती जा रही नंदिनी अचानक से एक लड़के से टकरा गयी और ये ३-४ संवाद उसके मन को अन्दर तक झंझोड़ गए. रात भर वो सो न सकी. उस लड़के का एटीट्युड उसे कहीं न कहीं चोट पंहुचा कर भी उसके दिल में थोड़ी जगह बना रहा था. आज तक किसी ने उससे इस तरह से बात नहीं की थी न ही पलट कर ऐसा जवाब दिया था. उसके मित्र गण अकसर उसकी प्रशंसा करते और वो फूली न समाती. मगर आज ऐसा क्यों हुआ था कि उस लड़के ने उसे मुड़कर नहीं देखा. नंदिनी यह सब सह नहीं पा रही थी एक देहाती लड़का उसे उसकी गलती बता कर चला गया और वो कुछ भी नहीं कह सकी. यह सब सोचते हुए रात के 1 बज गए. आसमान में चाँद बादलों के साथ लुकाछिपी खेल रहा था मगर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी.
गेहुआं रंग, बड़ी बड़ी आँखें, तीखी सुतवा नाक, करीने से कटे हुए बाल, सदी चेक शर्ट और जीन्स पहने हुए तकरीबन ५’८-५’९ कद के व्यक्तित्व और एंग्री यंग मन लुक ने नंदिनी को उसका कायल बना दिया था. उसका जादू नंदिनी के दिल को अपने काबू में करने का भरसक प्रयास कर रहा था और शायद सफल भी हो चुका था.
“उठ जा बेटा, देख 11 बज रहे हैं. आज से पहले तो तू इतना कभी नहीं सोयी”, प्यार से नंदिनी के बालों में हाथ फेरते हुए दादी माँ ने कहा. “प्लीज आज सोने दीजिये न दादी माँ कितना रोमांटिक सपना देख रही थी मैं, आपने खामखांह मेरी नींद ख़राब कर दी”, लड़ियाते हुए नंदिनी ने फिर से आँखें बंद कर ली.
नंदिनी अपनी दादी माँ के पास एक हफ्ते के लिए रहने आई थी. बचपन को दुबारा जीने की ललक उसे फिर से उन खेतों, बाग़-बगीचों में खींच लायी थी जहाँ हर साल उसकी बचपन की गर्मियों की छुट्टियां दादी माँ के हाथ के बने स्वादिष्ट आलू के परांठे, मक्खन और ताज़ा दूध दही की खिलावट में ख़तम होती थी. नौकरी लगने के बाद वह तनावपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थी, कि उसने कुछ दिन की छुट्टी लेकर दादी माँ के आँचल की छाँव में रहकर सुकून भरे पल बिताने का फैसला किया.
“अम्मा ... अरे कहाँ हो अम्मा”?
“अरे बेटा तुम! कब आये दिल्ली से”?
“जी कल सुबह ही आया, रास्ते से गुज़र रहा था. आपके घर से कुछ पकने की खुशबू दूर से ही आ रही थी. बस सूंघता हुआ सीधा आपके पास आ गया.”
बहुत अच्छा किया ... मेरी पोती आई हुई है उसके लिए शाही पनीर बना रही थी. ठहरो, तुम्हारे लिए भी लेकर आती हूँ”.
“जी अम्मा”
सागर हर साल होली पर अपने मामा मामी के घर आता था, यहाँ की होली में उसे वो मिठास और रंग मिलते जिसकी दिल्ली जैसे महानगर में कमी थी. वहां न कोई रौनक न हुडदंग, बस औपचारिकतायें निभाते हुए सोसाइटी के लोगों के गुलाल लगा कर हैप्पी होली कहना और कुछ नही.
“कोई आया है क्या दादी माँ”?, नंदिनी ने रसोईघर में घुसते हुए सवाल किया. “हाँ बेटा पड़ोस का एक लड़का आया है”, दादी माँ ने खाना परोसते हुए कहा. “यह शाही पनीर उसके लिए ही लेकर जा रही हूँ”, दादी माँ ने मुस्कुरा कर प्यार से नंदिनी का गाल थपथपाया. “दादी माँ कोई लड़का आया है या आपका बॉयफ्रेंड ... शायद दादी माँ को शादी का ख्याल दिल में आया है , इसीलिए दादी ने मेरी किसी को खाने पे बुलाया है” , आँख मारते हुए नंदिनी ने गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया. “चुप कर बेशरम लड़की, कुछ भी बोलती है. पता नहीं आजकल के बच्चों के संस्कार कहाँ चले गए. बेहूदा मजाक करते हुए एक बार भी नहीं सोचते”, गुस्से में बडबडाते हुए दादी माँ रसोई से बाहर निकल गयी.
“सॉरी दादी माँ”, नंदिनी चिल्लाई.
दादी माँ से कोई प्रतिउत्तर न मिलने पर वह बहार बैठक की तरफ आ गयी और सामने सागर को देख कर ठिठक गयी. उसके दिल की धड़कन अचानक से तेज़ हो गयी. असहज सी नंदिनी ने सागर को नज़र अंदाज़ करने का अभिनय करते हुए दादी माँ पर नाहक ही बिफरने का प्रयास किया.
“दादी माँ मुझे बहुत भूख लगी है, प्लीज कुछ खाने को दो ना”
“अभी लाती हूँ, मगर पहले इससे मिलो. यह सागर है, रमेश काका का भांजा. बहुत ही मेहनती और कर्मठ लड़का है, कठिन परिस्थितियों में भी खुद को संयमित रख कर दिल्ली में एक बहुत अची नौकरी पर लगा हुआ है”.
“यह सब सुनकर नंदिनी का रुझान सागर की तरफ और भी बढ़ गया. दोनों ने एक चिर-परिचित मुस्कान एक्सचेंज की फिर बातों का सिलसिला चल पढ़ा. फिल्म, एक्टर-एक्ट्रेस, पर्यटन स्थल, जॉब, करियर क्या क्या बातें नहीं की दोनों ने. जब सागर मुस्कुराते हुए अपने बालों में हाथ फेरता तोह नंदिनी के पेट में तितलियाँ मोहिनीअट्टम करने लगती. अब वह हँसता तो नंदिनी का दिल गुनगुनाता “सैंया दिल में आना रे, आके फिर न जाना रे”. वह चाहती थी यह खुशगवार पल यहीं थम जाये, सागर को हँसते बोलते हुए उसकी भूरी-भूरी आँखों में टकटकी लगा कर अपनी तस्वीर देखे. सिर्फ 10-15 मिनट के लिए दादी माँ से मिलने आया सागर शाम के 5 बजे अपने घर लौट रहा था.
रात के 11 बज रहे थे. चांदनी रात में नंदिनी गुनगुना रही थी “तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया, पिया पिया बोले मतवाला जिया”. उसके गुलाबी होठों पे बरबस मुस्कान मौजूद थी. सैकड़ो प्यार भरे गाने उसकी जुबां से खुद-ब-खुद निकले जा रहे थे.
“हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई ज़िन्दगी चाहता हो जैसे ” ,
तेरा मिलना पल दो पल का मेरी धडकनें बढ़ाये , डर है मुझे प्यार तेरा मेरी जान ले ले न जाये ” ,
“क्योंकि तुम ही हो अब तुम ही हो, ज़िन्दगी अब तुम ही हो ” ,
“मुस्कुराने की वजह तुम हो, गुनगुनाने की वजह तुम हो” गुनगुनाते हुए कब रात के 2 बज गए पता ही नहीं चला.... 80, 90 का दशक और 21वी सदी का सफ़र उसने कुछ घंटो में ही तय कर लिया था. लता मंगेशकर से लेकर. सोनू निगम और कब अरिजीत सिंह तक पहुची वह खुद भी अनजान थी.
“दादी माँ”
“हम्म”
“उम्म्म, सागर दिल्ली में जॉब करता है न”?
“ह्म्म्म क्यों”?
“दादी माँ, मैं रमेश काका के घर चली जाऊ”? मैंने बहुत सालों से नहीं देखा उन्हें. पहले वह हमारे खेतों की देखभाल किया करते थे. मैं कितना तंग किया करती थी न उन्हें दादी माँ. आपको याद है एक बार मैंने उन्हें टूटी कुर्सी पे बिठा दिया था... और वह धडाम से गिरे थे”, कहते कहते नंदिनी ठहाके मार कर हंसने लगी.
“बद्तमीज़ तो तू शुरू से रही है. अपनी पिटाई याद है य भूल गयी”, इस बार दादी माँ ने चुटकी ली.
“अच्छा बस बस”, झूठा गुस्सा दिखाते हुए नंदिनी बोली. “मैं सोच रही थी सागर से भी नयी जॉब के बारे में डिस्कस कर लूं”, कहते हुए नंदिनी थोडा सकपकाई.
“हम्म चली जा... और सुन मैंने खीर बनायीं है आज, वह भी लेती जाना”.
नंदिनी के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. तैयार होने वह ऐसे भागी जैसे ओलम्पिक प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल हासिल करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य है.
आधे पौने घंटे के श्रृंगार के बाद नंदिनी तैयार थी. आईने में खुद को देख कर उसने फिर से अपने सौंदर्य पर गर्व महसूस किया. कोई भी लड़का उसके हुस्न के मोह-पाश से नहीं निकल सकता, सागर को भी मंत्र-मुग्ध होना ही पढ़ा. आसमानी रंग के सूट और माथे पर छोटी सी बिंदी लगाकर वह और भी अधिक खूबसूरत लग रही थी. दादी माँ ने ही कहा था उसे कुछ पारंपरिक पोशाक पहन कर जाने को. सूट से मेल खाती चूड़ियाँ और कानों के कुंडल पहन कर जब वह कमरे से बाहर आई तोह दादी माँ ने उसका माथा चूम कर काला टीका लगा दिया.
खिली खिली धूप में पगडंडियों पर अपने कदम नापती हुई नंदिनी सागर के बारे में सोच सोचकर ही रोमांचित हुए जा रही थी.
“काका!... कोई है??“, नंदिनी ने रमेश काका के घर पहुच कर आवाज़ लगाई. परन्तु कोई उत्तर न मिला. “काकी.... काकी.... “ इस बार उसे किसी की पायलों की झंकार सुनाई दी. काकी के बारे में सोचते हुए उसने अपने गुलाबी-आसमानी दुपट्टे को कंधे से फैला लिया.
“जी बोलिए”, दरवाजा खुलने पर भीतर से एक लाल और गहरी नीली साड़ी पहने एक स्त्री ने पूछा.
एक लड़की को काका के घर पर नंदिनी सोच में पढ़ गयी. “रमेश काका से मिलना था”, नंदिनी ने हिचकिचाते हुए कहा.
“अन्दर आइये प्लीज”, लड़की ने आदरभाव जताते हुए कहा.
नंदिनी ने चुपचाप घर के अन्दर प्रवेश किया. घर के अन्दर एक नज़र डाली. सब कुछ काफी बदल चुका था. खुले आँगन को पाट दिया था. दीवारें भी पक्के फर्श की नींव पा कर मजबूती से खडी हुई मालूम पढ़ रही थी. काका का घर अब निम्न वर्गीय से उठकर निम्न मध्यम वर्गीय की श्रेणी में आ चुका था.
“मेरी दादी माँ ने खीर भिजवाई है”, अल्प मौन तोड़ते हुए नंदिनी बोली.
“थैंक यू वैरी मच ” . लड़की के स्वर में आत्मीयता के साथ अंग्रेजी ज्ञान की अच्छी पकड़ दिखाई दी. “घर के सभी लोग किसी काम से शहर गए हैं, शाम तक लौटेंगे. आपको कोई ज़रूरी काम था तो आप मुझे बता दीजिये, आय विल कन्वेय योर मेसेज”, खीर का डोंगा साइड टेबल पर रखते हुए उसने कहा.
“आप सुलेखा हैं क्या? माफ़ कीजिये मैं काफी सालों बाद यहाँ आई हूँ तो चेहरे पहचानने में मुश्किल हो रही है. आय होप यू डोंट माइंड दिस ” , नंदिनी ने गौर से लड़की के चेहरे को देखते हुए प्रश्न किया.
“नो नॉट एट ऑल , सुलेखा दीदी मामा जी की बेटी हैं. मैं तो इस घर की बहू हूँ”, मुस्कुराते हुए लड़की ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया और रसोईघर की तरफ चली गयी. नंदिनी का मन उसके दिल से हजारो प्रश्न दाग रहा था. थोड़ी देर बाद वह एक ट्रे में पानी और कुछ मिठाई, गुझिया, नमकीन आदि लाती दिखी.
“आप कौन हैं? आय मीन रमेश काका का तो कोई बेटा नहीं है न”, पानी का गिलास उठाते हुए नंदिनी ने फिर एक प्रश्न किया.
“मेरा नाम जाह्नवी है, आपके रमेश काका मेरे हस्बैंड के मामा जी हैं”
यह सुनते ही नंदिनी की आँखों के आगे अँधेरा छा गया. खुद को सँभालते हुए उसने स्वर को धीमा करते हुए पुछा, “सागर की पत्नी हो”?
“हाँ मगर आप सागर को कैसे”??
“कल सागर मेरी दादी माँ के घर आये थे, वहां उनसे....”, नंदिनी ने आगे कुछ न कह कर वाक्य को वहीँ विराम दे दिया. बहुत ही औसत रंग रूप लगा नंदिनी को जाह्नवी का. न चेहरे पर कोई आकर्षण न ही चाल ढाल में कोई अदा.
“अरेंज्ड मैरिज?”, पूछते हुए नंदिनी ने खाँसने का अभिनय किया ताकि जाह्नवी कोई गलत प्रतिक्रिया न दे पाए.
“नो , इट्स अ लव मैरिज” , हँसते हुए जाह्नवी बोली. नंदिनी से किसी तरेह की प्रतिक्रिया न पाकर उसने फिर कहा, “अभी एक साल ही हुआ है हमारी शादी को. पहले साथ काम करते थे और अब साथ में रहते भी हैं”.
नंदिनी को उसका हँसना मुस्कुराना इस कदर नागवार गुजर रहा था कि उसने वह से तुरंत जाने का निर्णय किया. “अच्छा मैं चलती हूँ, फिर कभी आउंगी”, बनावटी मुस्कराहट के साथ नंदिनी ने फिर से एक बार जाह्नवी के चेहरे को परखने की कोशिश की. सागर कैसे इसकी तरफ आकर्षित हो गया की ब्याह रचा लिया. यह सवाल उसके मन में बुरी तरह कौंध रहा था. मेरे सामने तो यह जाह्नवी कहीं भी नहीं टिकती. सोचते हुए वह अपने दिल में नफरत की आग लेकर बाहर निकल गयी.
घर आकर वो आक्रोश से भरी हुई थी. एक-एक करके उसके ज़हन में सवालों की बरसात होने लगी. क्यों गयी वह वहां? क्या सोच कर गयी थी? सागर झूठा और धोखेबाज़ इन्सान निकला. ऐसे नीच आदमी को इसकी सजा ज़रूर मिलनी चाहिए. तभी उसके अंतर्मन से आवाज़ आई.... “यह तुम क्या बोल रही हो नंदिनी? सागर ने तुम्हे कब कहा कि वह तुमसे प्रेम करता है? उसने कब अपनी मोहब्बत का इज़हार किया? उसने एक दोस्त की तरह तुमसे बात की और तुमने यह समझा कि वह तुम्हारी सुन्दरता को देख कर तुमसे प्यार कर बैठा है. जिस दिन तुम उससे पहली बार मिली, उस दिन तो उसने तुम पर रत्ती बराबर ध्यान नहीं दिया और घर पर भी उसने तुमसे ख़ुशमिज़ाजी से बात की. मगर तुम उसे खुद में दिलचस्पी लेना समझ बैठीं. अपने सौन्दर्य पर इतना घमंड मत करो नंदिनी की औंधे मुह गिरो. हर लड़का सिर्फ खूबसूरत चेहरा और छरहरी गोरी काया देख कर ही आकर्षित नहीं होता. ख़ूबसूरती शरीर के अन्दर होती, पहचानो तुम उसे और अपने दिल से ये मैल निकाल बाहर करो.”
अपनी अंतरात्मा से यह सब सुनकर फफक फफक कर रो पढ़ी नंदिनी. उसके हिरनी जैसे सुन्दर नेत्रों से अश्रु धरा बहने लगी. खुद को शीशे में देख कर उसने महसूस किया कि उसके गौर वर्ण मुख पर कालिख पुती हुई थी. अपने दुपट्टे से उसने मुख साफ़ करने का प्रयास किया परन्तु कालिख बढती जा रही थी..... देखते ही देखते वो राख के ढेर में तब्दील होती दिखाई दी. डर से नंदिनी की चीख निकल गयी.
“दादी माँ मैं कल घर वापस चली जाउंगी”, रसोई में दादी माँ का हाथ बंटाते हुए नंदिनी बोली.
“कल? तू तो परसों जा रही थी. कल क्यों?”, अनभिज्ञ दादी माँ ने जाने का कारण पूछा.
“बस दादी माँ आपकी गोद में सर रख कर काफी आराम कर लिया. ऐसे कब तक मुश्किलों से दर कर आपके आँचल में छुपती फिरुंगी. अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, जिम्मेदारियों का एहसास हो रहा है मुझे. घर में मम्मी भी अकेली होंगी, उनके साथ भी थोडा वक़्त बिता लूं.”
“अरे वाह मेरी गुडिया रानी तोह बहुत समझदार हो गयी है”, दादी माँ ने उसे पुचकारते हुए कहा.
“हाँ दादी माँ ज़िन्दगी के कुछ पहलु आपको बहुत कुछ सिखा आते हैं”, कहते हुए नंदिनी अपनी दादी से लिपट गयी. उसकी आँखें नम थी. दादी माँ को कुछ पता न चले इसलिए वह उन आंसुओ को पी गयी.
बस में खिड़की से बहार देखते हुए उसने एक बार गाँव की तरफ देखा और फिर आँखें बंद कर ली. इन २-३ दिनों में उसे एक गहन अध्ययन हुआ, जो शायद जीवन पर्यंत नहीं हो पता. “छोड़ आये हम वो गलियाँ ... छोड़ आये हम वो गलियाँ... ” गुनगुनाते हुए नंदिनी अब एक नए दृष्टिकोण को अपना कर काफी हल्का महसूस कर रही थी...........!
#Preeti

Nice story
ReplyDeleteAwesome!!!!!!!!
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