प्रेरणा Part-1

 ( A True Love Story Never Ends ) सरस्वती विद्या मंदिर का आठवां दर्जा तारीख याद नही , सन 2000 सुबह माँ ने उठाया और साइड से मांग निका...


 ( A True Love Story Never Ends )
सरस्वती विद्या मंदिर का आठवां दर्जा तारीख याद नही , सन 2000

सुबह माँ ने उठाया और साइड से मांग निकाल कर राजा बेटा बना दिया ।

अपनी 18 इंची साइकिल को पोछ कर ( जो अम्मा की सिफारिस से मिली थी) अम्मा बाबा के पैर छूकर निकला था .......तालीम लेने...।


घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही वाला गाना गाते हए ....... रस्ते में उसका घर पड़ा ........ ।

अरे प्रेरणा ..... क्या हुआ तुम्हारी डलिया वाली साइकिल क्या हुई ....... बेचारी पैदल जा रही थी ।

हम भी ठहरे प्रेम प्रतिज्ञा के हीरो और खुद पैदल और वो साइकिल पर ..... और असलियत में साइकिल इस लिए दी की मैं लेट पहुँचूंगा और मास्साब को पाठ नहीं सुनाना पड़ेगा ।

मोहन तायल मास्सब ने क्लास में घुसते ही सब से पहले हमीं को खड़ा किया और 5 मुग़ल बादशाहों के नाम सुनाने को बोले ........( मोहन तायल मास्सब हमारे लिए अमरीश पूरी तब से बन गए थे जब गलती से हमारे धक्के से उनकी साईकिल गिर गयी थी और उसकी कैची टेंढ़ी हो गयी थी , और इतिहास से तो हमरी दुश्मनी अनादि काल से जग जाहिर ही है )

बादशाहों के नाम पर हमे सिर्फ अकबर का ही नाम याद था , क्यूकी अकबर हमारे मोहल्ले में सब्जी बेचने आया करता था ,

नतीजन 4 मिनट बाद हम मास्साब की कुर्सी के बगल में मानव तन लिए हुए कुक्कड़ ( मुर्गा ) आकृति बना रहे थे। हमे उतना दर्द मानव मात्र से मुर्गा बन जाने का नही था , ( शायद दिन में एक बार मुर्गा बनाना हम अपनी नियति मान बैठे था )

ना ही बादशाहों का नाम भूल जाने का हमे गम था , जितना हमे देख कर प्रेरणा का मुंह दबा के हँसने का था का दर्दो गम . ......!

प्रेरणा पढ़ने में ठीक थी और कभी गर गलती से गलती हो भी जाती थी तो कोई मास्साब उसे मुर्गा नही बनाते थे , सिर्फ एक दो छड़ी मार के बैठे देते थे। और हमे मुर्गा बने देख कर वो अपने 2 टूटे दाँत निकाल निकाल कर हँसती रहती थी , पता नही खुद को क्या समझती थी ,

खैर अब हमारी ज़िंदगी का सब से बड़ा घोषित अघोषित दुश्मन कोई था वो यही प्रेरणा की बच्ची थी। और हमारे जीवन का एक मात्र उद्देश्य प्रेरणा को कम से कम एक बार मुर्गा माफ़ी चाहूँगा "मुर्गी" बनवाना ही था !


उस दिन छुट्टी के बाद हमने अपने जीवन का ये एक मात्र ध्येय अपने परम मित्र रितेश को बताया। ........ पहले तो रितेश 1.18 मिनट हमे देखता रहा , फिर अपने स्याही वाले पेन से निकली स्याही से रंगी ऊँगली उठा कर बोला अबे अवस्थी तुम गए हो पगला , भला कोई मास्सब उसे काहे मुर्गा मुर्गी बनएगे ?

काहे पूरे दर्जा में हमी मुर्गा बनने और अंडा देने के लिए बने है क्या ?

हमे समझ नई आ रहा था की जब भगवान ने हमे इंसान बना ही दिया है तो ये तयलवा भगवान का फैसला बदलने में काहे लगा है।

अबे पंडित रहोगे बकलोल ही , अबे प्रेरणवा कैसे मुर्गा बन सकती है , वो लड़की है और स्कर्ट पहनती है रितेश ने बिलकुल निर्मल बाबा वाले अंदाज में हमे ज्ञान दिया . .....!
अबे हाँ , हमे तो ये याद ही नही था हमे लगा जैसे हमारी सारी उम्मीदे टूट गयी। लेकिन बाद में हम घंटो ये सोच कर हँसते रहे की अगर प्रेरणा मुर्गा बनती तो कैसी लगती . दो साल बाद अब हम 10 वी में आ चुके थे और बहुत कुछ बदल चुकाथा .....।

3 दिन की छुट्टी के बाद आज स्कूल खुला था , हम अपनी आदत से मजबूर क्लास के गेट पर खड़े थे , ठीक 9 बज कर 57 मिनट पर प्रेरणा आसमानी और सफ़ेद रंग के सूट को पहने खुले बालो से मेरे बगल से निकल गयी , उसके खुले बालो से निकली क्लिनिक प्लस शैम्पू की खुशबू मेरे जहन तक पहुंच गयी।

दोस्तों ये वो दौर था जब हम आर्यमान - ब्रम्हांड का रक्षक के दौर से निकल कर घर से निकलते ही , कुछ दूर चलते ही , रस्ते में ही है उसका घर वाले रास्ते पर बढ़ चले थे , अब हम समझ चुके थे कि शक्तिमान ही गंगाधर है , अब हम चंपक से आगे वाया सुमन सौरभ , सरस सलिल की ओर अपने कदम बढ़ा चुके थे, अब तो हमे सुबह की स्कूल प्रार्थना में या कुंदेन ........ की जगह जादू है नशा है , मदहोशियाँ है सुनाई देता था।

इन बहुत से छोटे बड़े परिवर्तनों के बीच में जो सब से बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन था वो ये की प्रेरणा जो हमारी सब से बड़ी घोषित अघोषित दुश्मन थी वो अब हमारे लिए सब से खास बन चुकी थी , वैसे तो ये बदलाव 9 वी क्लास के अंत में तब आना शुरू हुआ था उस ने सब से छुपा कर एक मुट्ठी कचरी हमे दी थी ,

10 वी क्लास में हम अपने आस पास के बदलाव को करीब से महसूस कर रहे थे , ये साला साल (2002 ) बड़ा उथल पथल वाला था और ये दिल आशिकाना देखते हुए हमे ये ज्ञान की हो न हो हम प्रेरणा से मोहब्बत कर बैठे थे, ये हमारे जीवन की पहली आतंकवादी घटना थी

क्लास के 3 महीने में हमने उनके इतिहास के रजिस्टर को ये कह कर माँगा की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का चैप्टर पूरा करना है , और उसी रात लालटेन की रौशनी में हमने ख़ुश्बू वाली रिफिल के पैन से अपने जीवन का प्रथम प्रेम पत्र लिखा ( जिसके २ पेजो में पूरी 26 गलतिया थी जो उसने हमे बाद में बताई थी ) और उनकी इतिहास के रजिस्टर के हल्दी घाटी का युद्ध वाले चैप्टर में रख दिया , जिसका जवाब उन्होंने तीन लाइनो की एक चिट में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार के कारण वाले चैप्टर में दिया , वो भी हमे पसंद करती है इसकी आधिकारिक पुष्टि हो गयी थी।

अब हम अपने आप को चंकी पाण्डेय का छोटा भाई मान कर प्रेम गली में अपने छोटे छोटे पैरो को बढ़ा चुके थे , क्लास में वो लड़कियों की तीसरी लाइन की सब से किनारे की और बैठती थी और हम लड़को की तीसरी लाइन के सब से किनारे पर , हमारा मुर्गा बनना अभी बदस्तूर जारी था पर अब प्रेरणा को हमे मुर्गा बने देख कर बुरा लगता था और उनका बुरा लगना हमे जरा भी पसंद नही था .....!

सप्ताह में 2 पत्रो का आदान प्रदान जरुरी था ….......,हमारे पत्रो में जँहा अल्ताफ रजा की या ट्रक के पीछे पढ़ी गयी शायरियाँ होती थी .........वहीं उनके पत्रो में माँ ने कल दाल की कचौड़ियाँ बनाई थी , .......शेरू सिर्फ ब्रिटानिया बिस्किट खाता है जैसी नितांत व्यवहारिक पंक्तिया होती थी , और इसी सब के बीच उनके जन्मदिन तारीख नजदीक आ गयी ,......!


उनके गिफ्ट हेतु धन उपार्जन के लिए हमने अपनी दर्जा 3 से 9 तक कॉपी किताबे( बस चलता तो दर्जा 10 की भी ) बेच दी , बाद में पता चला की जिस रद्दी का वजन बढ़ाने के लिए हमने माँ की निर्मला और पिता जी की आखरी जंग उपन्यास बेच दी है वो अभी उन दोनों ने पूरी नही पढ़ी है ( जिसके लिए रात में आठ के ठाट के बाद पिता जी ने हमे जी भर के जुतियाया था )


और इस से मिले 87 रुपय से साईकिल से जा कर सुरेश जर्नल स्टोर की मशहूर दुकान से 37 रुपय का रिया बिंदास सेंट ( बाद में पता चला ये सिर्फ जेंट्स का होता है ) एक गुलाबी रुमाल और लाल रंग का दिल के आकर का ग्रीटिंग लए थे , उस ग्रीटिंग को रखने का उचित न स्थान होने के कारण प्रेरणा ने लेने से मना कर दिया था ( बाद में मेरे मेरे छोटे भाई ने उस ग्रीटिंग का जहाज बना कर पानी में चलाया था ) ......!
इन सब बड़ी बड़ी बातो के बीच लास्ट एग्जाम के 3 दिन मिले पत्र में प्रेरणा ने बताया की उनके पापा का ट्रांसफर हरिद्वार में हो गया है....।


हमेशा की तरह हमारा आखरी पेपर कला का था , मैं तीन सालो से बनाता आ रहा स्वच्छ घर और साड़ी की किनारी पुरे 2 घंटे तक बनाता रहा था , जबकि बाकी सारे लड़के लडकिया 50 मिनट में ही कॉपी जमा करके जा चुके थे और मास्साब हमारी और प्रेरणा की कॉपी जमा करने क़ा इंतिजार करते करते सीट पर ही सो गए थे।


कॉपी जमा करने के बाद हम स्कूल के पीछे वाले कमरे में मिले थे , उस दिन प्रेरणा ने लाल रंग का सूट पहना था , और मैंने पहली बार किसी लड़की को छुआ था और रोते रोते उसके माथे को चूमा था ........! ( सुनील शेट्टी वाले अंदाज में , क्युकी तब तक हमारे सवर्ज्ञ श्रीमत इमरान हाशमी जी का हमारे जीवन पर प्रभाव नही पड़ा था )


पहली बार उसे इतने करीब से उसे देखने पर ये जाना था की उसके टूटे 2 दांतो में से एक अब तक नही निकला ( जिसका कारण उसने ये बताया था की उस वाले दाँत के टूटने पर वो उसे चूहे के बिल में नही डाल पायी थी जिसकी वजह से वो दांत अब तक नही निकला) मेरे दिए गए बिंदास सेंट ( जो की जेंट्स था ) को उसने लगा रखा था , उसने गले में शायद पाण्ड्स ( मोगरा फ्लेवर ) लगाया था और बालो से शैम्पू के जानी पहचानी खुशबू आ रही थी , उस खुशबू का अश्क मेरे जहन में ऐसा बसा की उसे अरमानी , बरबरी और लिवोन के विलायती परफ्यूम भी न मिटा पाये .....!


खैर मुझे कभी न भूलने और खत लिखने का वायदा करके वो हरदम के लिए चली गयी। ( मै खत का इंतिजार करता रहा बिना ये सोचे की मैंने उसे अपने घर का पता दिया ही कब था)

फेसबुक के दौर में सब पीछे छूट गया , हाँ अब भी जब कभी फेसबुक में कोई प्रेरणा नाम का दीखता तो उसे फ़्रैंड रिकवेस्ट जरूर भेजता ,


उस के बाद भी बहुत सी लड़कियाँ जीवन में आई और गयी भी , लेकिन फिर किसी के बालो में मुझे वो शैम्पू की खुशबू न मिल सकी , व्हट्सप्प और फेसबुक के संदेशो में ख़ुश्बू वाली रिफिल के पैन की गंध न थी .......।

Pradeep Awasthi

CONTINUE...


3 comments:

  1. What a beautiful story sir fan of u

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  2. What a beautiful story sir fan of u

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  3. So touchy and beautiful story. Guruji finally is story ko ek mukam mil hi gya.thanks a lot guruwar.

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