अब जीना चाहता हूँ...

फ़ैलाने दो पंख मुझे, कि अब उड़ना चाहता हूँ, बैठ लिया डर कर बहुत, कि अब जीना चाहता हूँ। घूमने दो इस जग को मुझे, बांधो ना सीमाओं में, बहुत रु...

फ़ैलाने दो पंख मुझे,
कि अब उड़ना चाहता हूँ,
बैठ लिया डर कर बहुत,
कि अब जीना चाहता हूँ।

घूमने दो इस जग को मुझे,
बांधो ना सीमाओं में,
बहुत रुक चुका इंतज़ार में,
अब आगे बढ़ने दो।

बीत गया है समय बहुत,
काम अभी है बाकी,
जाना है दूर बहुत,
अब बस मुझको चलने दो।

जीवन में खोया बहुत,
अब पाने की इच्छा है,
मेहनत से डरता नहीं,
इरादा मेरा पक्का है।


लौट के फिर मैं आऊंगा,
जीत कर लक्ष्य सभी,
पंछी जैसे लौटते हैं,
रात को अपने घर सभी।।

By-AKASH JAIN

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