~~एक पगली लड़की~~

रोज़ सुबह जब घर से ऑफिस को निकलता हूँ, तो कुछ ही दूर चलने पर एक घर आता है। वहाँ वो रहती है। वही जिसके लिए 'असहिष्णु' हो गया...

रोज़ सुबह जब घर से ऑफिस को निकलता हूँ, तो कुछ ही दूर चलने पर एक घर आता है। वहाँ वो रहती है। वही जिसके लिए 'असहिष्णु' हो गया हूँ। रोज़ उस को देख लेने भर से दिन बन जाता है। ऐसा हर किसी की ज़िन्दगी में होता है। मेरी ज़िंदगी में भी हो रहा है।

वो बिहार है, उसके लिए सब कुछ छोड़ सकता हूँ। वो मेरा गाँव है, उसके घर तक होकर आना मेरा कर्तव्य है। वो दसवीं की बोर्ड परीक्षा है, पागल हूँ उसके लिए। वो भक्त नहीं है, मुझसे दूर ही रहती है। वो कांग्रेसी भी नहीं है, जीत लिया है उसने मुझे। वो आम भी नहीं है, सबसे अलग है। पर शायद फिर वो अरहर है, उसको सिर्फ दूर से देखकर ही खुश हो लेता हूँ। वो राम मंदिर है, वो एक दिन जरूर मेरी बन भी जाएगी। वो भूकम्प का झटका है, उसको देख हिल सा जाता हूँ। वो गुजरात मॉडल है, कभी कभी नामुमकिन सा लगता है, जो कि है नहीं।


पर अब ऐसे में 'असहिष्णु' हो जाना सही नहीं। 'सहिष्णुता' ही प्रेम का आधार है। ये 'जबरदस्ती' नहीं हो सकता। गठबंधन के लिए भी जरुरी है विचारों का मिलना। 'आप' ऐसे किसी से कैसे गले मिल सकते हैं, जब तक कोई आप को पसंद न हो।


वो सेमेस्टर एग्जाम है, चुपके से ही सही बालकनी से देख ही लेती है। वो रट्टा नहीं, पूरा कांसेप्ट है। वो सरकारी नौकरी है, सामान्य के लिए नहीं बनी। रोज़ यही सोचता हूँ कि काश, कुछ जगह उसके दिल में मेरे लिए भी आरक्षित हो जाती तो। काश, वो प्रधानमंत्री की तरह चुप रहकर भी, इशारे से ही कुछ कह देती तो।
काश वो, केजरीवाल की तरह, सब बातों को छोड़ मेरी हो जाए तो। काश वो भी कभी मुझसे मिलने के लिए विदेशी दौरे पर आये तो। शायद सब सपना है, वो कल भी कश्मीर थी, पास होकर भी दूर, साथ होकर भी अलग, वो आज भी कश्मीर है, अपने आप में ही उलझी हुई, मेरा ही एक हिस्सा। मेरे दोस्त कहते हैं, उसे भूल जाओ, मैं सिर्फ इतना कह पाता हूँ, वो 'लखीमपुर' थोड़े ही है।

0 comments: