सन् 2002
अब हम 11th में आ गए थे, जिंदगी मस्त कट रही थी, आठ लोगों की कभी न टूटने वाली चखड़ी बन गयी थी । रितेश, समीर, गौरव, शान्तनु, पीयूष, अखिलेश, लकी जिसको प्यार से हम पुच्ची कहते थे और मैं प्रदीप, जिंदगी 20 इंची साइकिल पर ट्यूशन से ले कर विद्या मंदिर तक दौड़ती थी....। रितेश का किसी खाश की साइकिल की डलिया में लैटर डालना बदस्तूर जारी था ......लकी का किसी को जी जान से चाहना और न जाने क्या क्या .......।
हर कोई उन दिनों शाहजहाँ बन कर ताजमहल बनाने की कोशिश में लगा था ।
मौज मस्ती के दिन ...... और पढ़ाई ....इन्ही के बीच कभी कभी कुछ यादें जेहन में शोर कर जाती थी.... वो मास्टर साहब का मुर्गा बनाना और कुछ पुरानी यादें .......।
फरबरी की कोई ठंडी सुबह....
आर डी शर्मा की मैथ्स की बुक पर दर्शील शफारी की तरह मैं छत पर औंधे पड़े हुए सोचने में मग्न था...... आर डी शर्मा की जगह आर डी वर्मन के गाने दिमाग में चलते थे ।
सर्दियों की धूप भी कितनी मुलायम होती है । माँ नीचे स्नान कर रही होंगी, उसके बाद पूजा और फिर मुझे पुकारेगी ।
मैं आवाज़ दूँगा "हाँ माँ, अभी आता हूँ" । हालाँकि तब भी मेरे पास कोई काम नहीं होगा किन्तु देर लगा कर स्वंय का व्यस्त होना जताउँगा ।
फिर माँ पूँछेंगी "क्या कर रहे थे ?" कब से पुकार रही हूँ और फिर दबी आवाज़ में कहेंगी "ये लड़का भी न जाने कहाँ खोया रहता है" ।
माँ फिर मेरे सामने नाश्ते की थाली रखेंगी और वो कहेंगी "क्या सोचते रहते हो ?" । मैं खाता रहूँगा और इसी बीच में उत्तर कहीं खो जायेगा । उन्हें उत्तर की प्रतीक्षा नहीं होगी । मैं उठकर आधा गिलास पानी पियूँगा और आधे से हाथ धो लूँगा । माँ के पल्लू से हाथ पौछूँगा और देहरी से बाहर चला जाउँगा ।
इसी बीच करवट लेता हूँ और देहरी से बाहर के संसार में पहुँच जाता हूँ ।
2 दिन बाद प्रेरणा का जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है जब मैंने उसके गिफ्ट के लिए अपनी पुरानी बुक्स बेच दी थी ।
न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।
उसके सख्त निर्देश हैं कि वह अपना जन्म दिन अँग्रेजी तरीके से मनाएगी ।
उन दिनों वो रात के बारह बजकर एक सेकंड पर मुझे अपने सामने देखना चाहती थी । मैं इस कम उम्र पर चिढ़ता था । सोचता था कि यदि हम पच्चीस बरस के होते, तो वो कभी ऐसा जोखिम उठाने के लिए नहीं कहती । फिर स्वंय की इस समझदारी पर संतुष्ट सा महसूस करता था।
कैसे विश करूँगा इस बार, क्यूँकि प्रेरणा के हरिद्वार जाने के बाद सिर्फ एक बार फ़ोन पर बात हुई थी ....।
सोचा इस बार सामने न सही फ़ोन पर ही सही ....... लेकिन मन नहीं माना और हमारे प्लानिंग मास्टर रितेश ने हमारे मन को पड़ते हुए हरिद्वार का प्लान बना डाला था।
अगले दिन माँ को बताया कि दोस्तों के साथ हरिद्वार घूमने जा रहा हूँ और अपनी चखड़ी के साथ निकल लिया था ।
दोस्तों को साथ लेकर कोई केक पकडे था और कोई गिफ्ट .... एक PCO बूथ पर खड़ा था ..... डर के कारण लाइट में अपनी परछाई में भी अमरीश पूरी नजर आता था पता नहीं कौन विलेन फ़ोन उठाएगा। रात ग्यारह बजकर उनसठ मिनट हो गए...... खैर तीन छोटी रिंग करने के बाद एक पूरी रिंग की थी ..... जैसा हमेशा करता था ।
फ़ोन प्रेरणा ने ही उठाया और मैंने विश करने की वजाय सिर्फ एड्रेस पुछा और बोला कि 5 मिनट बाद छत के छज्जे पर खड़ी मिलना।
रवाना होने के लिए स्वंय को तैयार किया ..... मैं पहली दफा इतनी रात को चोरी से बर्थडे का केक काटने जा रहा था.... उसे छत से नीचे पार्क में आने के पर ख्याल से पसीना-पसीना हुआ जा रहा था ।
सूनी पड़ी गलियों में कुत्ते गश्त लगा रहे थे । आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे । छतों पर हल्की धुंध की चादर तन गयी थी । दूर से बारह के टनटनाने की आवाज़ आ चुकी थी गली में किसी के आने की आहट, दिल धकधक करने लगा, वो शौल ओढ़े हुए बिलकुल नज़दीक आ गयी थी । उसे पहचान कर पहली दफा इतनी ख़ुशी महसूस कर रहा था ।
"हैप्पी बर्थ डे, माय लव" सुनकर वो दोस्तों के सामने शर्मा गयी थी ।
पार्क में ही जल्दी से केक काटा और बड़ा वाला बैलून फोड़ा ...... बैलून फूटते ही और डर लगने लगा था ......कि अगर पकडे गए तो यहाँ तो कोई बात नहीं लेकिन घर में पिता जी आठ के ठाँठ के बाद जी भर के जुतियायेगे ।
खैर.....
उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर "हैप्पी बर्थ डे" बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । "अच्छा तो अब मैं चलूँ" ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से गले लगे हुए हैं ।
"अच्छा तो अब मैं चलूँ" कुछ देर बाद अलग होते हुए फिर से कहता हूँ । अबकी वो मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाती है ।
मैं पार्क की दीवार फलाँग कर चलने को होता हूँ । वो अभी भी वहीँ पर खड़ी है । फिर से लौट पड़ता हूँ । पास आकर "आई लव यू" कहता हूँ । वो मुस्कुरा जाती है और प्रतिउत्तर में "आई लव यू टू" कहती है । और फिर वे सभी क्षण स्मृतियों में लॉक हो जाते हैं ....
By- Pradeep Awasthi
Continued.........

Wahhhh sir ji.... love ho to esa....
ReplyDeleteWahhhh sir ji.... love ho to esa....
ReplyDeleteWash waah
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