वो बेखबर मेरा आराम ले गए!
हाँ !, हाँ मैंने झगड़े का आगाज किया था मगर,
वो बेशबर एक नाराज खत में उसे अंजाम दे गए!
हाँ शराब वही है, बोतल भी वही, बस वो मस्ती नहीं रही,
कि वो अपनी आँखों के नशीले जाम ले गए!
फकत दिन के अजनबी उजाले बचे हैं कुछ,
वो जो थी मेरी हमदर्द इक शाम, ले गए!
मैंने की थी मिन्नतें हजार, कई खत कई फूल भी भेजे,
वो आये थे चुपचाप इकदिन, इक लिफाफे में स्याही और फूलों के दाम दे गए,
एक दौर था, जब हथेलियों पे लिखके अपने नाम लबों से जोड़ा करते थे,
और आज कुछ लफ्जो में वही लब, मुझे गलती का नाम दे गए!
वो मखमली लम्हों कि नरम यादों में, कहाँ तकरार छुपी थी?
जब उलझी यादें सुलझी नहीं, तो ज़हन को बेखुदी का इल्ज़ाम दे गए!
तब तुम जोड़ कर वक़्त का पुर्जा पुर्जा, मेरे साथ को कुछ लम्हे बनाती थी,
अब मेरे तसव्वुर में रख्खे वो लम्हे, मेरा वक़्त तमाम ले गए!

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