बात 2005 की है, क्वालिटी मैनेजमेंट का फाइनल इयर था उसका और मेरा .......... दिसम्बर की एक सर्द रात और करीब 3 बज रहा था, लखनऊ विश्वविद्यालय के सुभाष होस्टल की छत पर बहुत ही बेचैन सा टहल रहा था मैं .............. फोन पर बहुत देर से बात हो रही थी, पर न जाने वो किस दुनिया में गुम थी…….!
……अन्ततः उसने कहा कल मुझे .....(घर)......हरिद्वार जाना है साथ चलो चलते हैं… और फोन कट गया। .....शाम को कैलाश छात्रावास से उसे लेते हुए ........ जनता एक्सप्रेस से लखनऊ से हरिद्वार के लिए निकला और सुबह करीब 5 बजे हरिद्वार पहुच चुका था .......!
लगभग 8 बजे हम दोनों गंगा जी के घाट पर बैठे थे ....!
.......उसने पूरे रास्ते मुझसे कोई बात नहीं की और उदास भी लग रही थी.. इसलिए मैंने उससे पूछा “क्या हुआ है तुम्हें, तुम इतनी उदास क्यों हो? ”
...... वो कुछ नहीं बोल रही थी और सिर्फ गंगा जी को निहार रही थी .........नदी की लहरों पर सूरज का पीलापन और पवन की गति, उसकी जुल्फों को कहीं दूर ले जाने का प्रयत्न कर रही थी........!
सर्दी अपने चरम पर थी पर हवाओं से उसका शर्बती रंग अभी छूट न सका था......... वह खामोश, नदी की ओर देखे जा रही थी........!
उसकी खामोशी में मुझे एक तुफान दिखाई दे रहा था.....… मैंने उसके हाथों को थाम कर उससे दोबारा पूछा “क्या हुआ है? कुछ बताओ भी......... या यूँ ही बैठी रहोगी। ”
........... उसने मुझसे कहा “मेरी शादी एक इंजीनियर से मेरे पिता जी तय कर चुके हैं, तीन महीने बाद मेरी शादी है....... मैं कल हमेशा के लिए हरिद्वार छोड़कर जा रही हूँ। ”
........उसकी आँखें बिल्कुल लाल, गाढे खून के डोरे साफ दिख रहे थे,.... आंशू निकलने लगे....... मैं आश्चर्य से.. “क्या?”
मेरे पूरे शरीर में एक बिजली कौंध गयी.. “क्या यह एक मजाक है? ”
“नहीं, यही सत्य है चाहें तुम जितनी बार भी पूछो........”
........“एक अज्ञात भय मेरे रोवों में समा गया और मैं पागलों की तरह सवाल किए जा रहा था…”
क्या तुमने हम लोगों के बारे में कभी अपने घर पर कोई बात नहीं की? तुम शादी से मना क्यों नहीं कर देती?
क्या वे लोग अपनी बेटी की बात नहीं मानेंगे.......क्या मैं तुम्हारे पिता से बात करने जाऊं.......क्या तुम्हें थोड़ा सा भी इस बात का एहसास नहीं कि मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता? ”
वह रोते हुए मेरे गले लग गयी और बोली .........
” मुझे क्षमा कर दो, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, मैं आज यहां हम दोनों के प्रिय स्थल पर इसलिए आइ हूं ताकि साथ गुजारे लम्हों को अपने साथ ले जा सकूं......... आज तुम्हारे साथ मैं आखिरी दिन यहां बिताना चाहती हूं, मैं अपने स्मृतियों में तुम्हें संजो के रखूंगी । ”
........ उसकी बातों को सुनकर मैं बस यही सोचता रहा कि आज तक जो हुआ सब पागलपन था....... मुझे वो दो दिलों की धड़कन याद आ रही थी जो एक ही लय में पहले धड़का करती थी........ ये अब वो लड़की न रही जो मेरे लिए सबकुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाया करती थी.......!
आज उसे मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण.. समाज, लोकलाज, परम्परा, परिवार.. ये सबकुछ लगने लगा था.. अब वो मेरी जान छोटी सी, प्यारी सी बच्ची न रही अब वो जवान और समझदार हो चुकी है।
उसके होठों की चिरआकांक्षित प्यास पागल हो उठी थी, वह मेरे होठों को चूमना चाहती थी....... वो मुझे अपने ह्रदय से लगाकर अंतिम बार जी भरकर रो लेना चाहती थी........... पर मुझमे किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे......!
....... सहसा मेरा मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा। मेरा दिल पत्थर हो चुका था......! मैं अपने से उसे दूर करते हुए कहा “चलो यहां से....”
.......मेरा रूकने का बिल्कुल मन नहीं था। मैं इस भीड़ से कहीं दूर भाग जाना चाहता था, पर उसके आग्रह करने पर हम दोनों नाव पर बैठे......!
..........लहरों की मधुर ध्वनि भी मुझे करकस लग रही थी। वो मुझसे अपनी बातों को कह कर रोती रही थी, और मेरा मन कहीं और था......! ......असल में मैं जी भरकर रोना चाहता था........... पर दिखावटी गंभीरता के साथ उसे सहारा दिये नांव पर चुपचाप बैठा रहा...........!
..........मैं उसे घर छोड़ने उसकी गली तक गया…. हर बार की तरह विदा होते वक्त, वह मुझे गले लगाकर चूमने की कोशिश की…. . और मैंने उसे रोकते हुए कहा.. “मुझे अब मुक्त कर दो अपने प्रेम से, अब तुम्हारा मुझ पर कोई अधिकार न रहा.... “
लखनऊ जाने की वापस हिम्मत न बची थी ......अपनी सांसों को जैसे वही छोड़ आया था ...........बेचैन सा बिना मंजिल के पागल पथिक सा उधर से फिर जनता एक्सप्रेस पकड़ चुका था मै ......... !
By-Pradeep Awasthi
Continued.....

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