कालेज के पीछे वाला ग्राउण्ड, वहां के आम और अशोक के पेड़ और उनके नीचे की वो सीमेंट वालीसीटें , जब भी जहन में आता है, कुछ पुराने पलों की याद अपने आप आ जाती है ! ये वो जगह है जहाँ कभीमदमस्त हवा के झोकों का मज़ा लूटा जाता था, तुम्हारे साथ! इतने सालों बाद भी याद हैं वो दिन, जब कभी बेफिक्र हो के चाय की चुस्कियां पी जातीं थी किसी नुक्कड़ की दुकान पर ! अब तो समा बदल गया है, पर यादों के इन पंछि...यों को उड़ने से कोई कहाँ रोक पाता है!
कॉलेज ख़तम हुए काफी अरसा हो गया, कालेज से यूनिवर्सिटी ,शहर और दोस्त सब बदल गए, नौकरी मिलगयी, कम आमदनी ही सही, पर नौकरी केबाद काफी कुछ बदल गया ! और तो और आदतें भी बदलगयीं ! किराये का फ्लैट, नयी घड़ी, अपना मोबाइल, नया बात करने का अंदाज़,यह सब शायद इस बात का इशारा हैं की वक़्त और हालत कभी एक जैसे नहीं रहते ! शायद हैसियत बदलने से सम्मान मिलने लगता है इस कलयुग में ! तुम्हे शायद लग रहा होगा की मैं अपनी उन्नत्ति की बात कर रहा हूँ, पर वह उन्नति क्या जिसमे
तुम्हारा साथ नहीं? जिसमे अपनों का साथ न हो ! लड़कपन का वादा (कुछ लोगों ने जवानी की गलती ) कह केलोगों ने तुम्हे मुझसे भुलाने की बहुत कोशिशें करी, लेकिन शायद उन्हें हमारे रिश्तेकी गहराई के बारे में नहीं पता था ! अबयह कह लो की जैसे तुम कहती थी, “ मुझे कहीं भूलेगे तो नहीं जाओगे लखनऊ और दिल्ली जाकर ?”, वह बार बार याद आता था|
हाँ, तुम्हारा कहना ठीक है की इतनी याद आयी तो कभी फ़ोन या चिट्ठी क्यों नहीं लिखी? सालों तकमिलने क्यों नहीं आया जबकि स्टेशन से तुम्हारा घर ज्यादा पास था ! दरअसल तुम्हे भूलने की वजह ढूंढता रहा हमेशा ! मुमकिनहैं कहीं मन में है एक डर है, या कहिये की आँखे न मिला पाने की कोई वजह है, तभी सामने से गुजरना छोड़ दिया है ! इसे आप शायद मेरा पागलपन कहो या कोई और नामदे दो, राह चलते तुम्हारे खाली हाथ कोमहसूस करना छोड़ दिया है !
आज तुम्हारे सामने बैठ के भी तुमसे आखें नही मिला पा रहा हूँ ! मन में एक ग्लानि भावना है कहीं—जिसको शायद तुम भी समझती हो ! पर ये तुम्हारी अच्छाई नहीं तो और क्या है कि वजाय मुझे शर्मिंदा करने के, आज भी तुम मुझसे उतना ही प्यार करती हो ! सोचते सोचते घड़ी में वक़्तबीता जा रहा है ! तुम ज़िद्द करती हो की मैं एक कप चाय तो पी के जाऊं ! तुम्हारी पुरानी आदत अभी भी वैसी ही है ! हालत भले हीकैसी भी हो, पर मेहमान-नवाज़ी में कोई कमी नआने पाये !
मेरी आखों में एक अजीब सी नमी है ! डर, शर्मिंदगी, या धोखा–क्याकिया है मैंने तुम्हारे साथ जो एक अपराध-बोध साहै मेरे मन में? तुम्हारे माथे को छू के देखताहूँ ! ज्वालामुखी सा गरम है ! अपने मन की कुंठा रूपी आग को शायद तुमने अपना बुखार बना लिया है ! फूल सी कोमल मेरी******, आज किस हाल में पड़ी है ! जवानी में ही चेहरे पर झुर्रियां, आधे बाल सफ़ेद, मानो सारीदुनिया का बोझ अपने सर पे ले लिया हो ! ना जाने कहाँ खो गयावो हँसी? जिसे रोकने के लिए टीचर कोतुम्हे टोकना पड़ता था ! तुम्हारे कहने पर भी अब मैं औरनहीं रुक सकूँगा !
नहीं, कोई ट्रेन नहीं पकडनी है ! एक बार फिर हिम्मत नहीं है–अपनी गलतियों का सामना कर पाने की ! कमज़ोर हूँ, शायद कम दिलभी, जो तुमसे आँखें मिलाने से घबराता हूँ ! तुम मेरा नाम बुला के रोकती हो मुझे, पर मैं तो उठके दरवाज़े के बाहर जा चुका हूँ ! तुम्हे यह नहीं दिखाना चाहता किमेरा नजरिया धुंधला और नम हो चुका है !वैसे भी रुकने का अब क्या फायदा , जो होना था वो हो गया , जो काम मैंकरने आया था , मैंने कर दिया ! ये बात अलग है की चोरी से चुपके से किया ! आप सोच रहे होंगे की मैंने ऐसा क्या किया यामैं ऐसा क्या करने आया था , दरअसल मैं आया था अपनी शादी काकार्ड देने और वो मैंने रख दिया चुपके से अपनी जाकेट से निकल कर जब वोचाय लेने गयी थी किचेन में !
अब फिर कालेज के पीछे वाले ग्राउण्ड में जा के कुछ पल बिताऊंगा, और विश्लेषण करूँगा अपनी गलतियों का, और तुम्हारे प्यार का ! यहाँ इस छोटी सी नहर के किनारे भी सब हालात मुझे एक एहसास दिलाना चाह रहे है-ये घर लौटते परिंदे, यह डूबता हुआ सूरज, ये कल-कलबहता पानी की कभी देर नहीं होती, पर असल में तो शयेद देर हो चुकी है ,यह शाम वाकई कुछ अजीब है !
मेरी इस विचार मुद्रा को अचानक चीरते हुए मेरे मोबाइल की SMS टोन बज उठतीहै '' बिन फेरे ,हम तेरे.........देह बनी न दुल्हन तो क्या , पहने नहींकंगन तो क्या ...........बांध लिया मन का बंधन, जीवन है तुमपर अर्पण ............बिन फेरे ,हम तेरे ''............एक अंजान नम्बर से मैसेज आया है '' MANNY CONGRATULATIONS मैं जरूर आऊँगी......................................yours's ............. ''
By- Pradeep Awasthi

wah sir ab yeha adda jama diye hain aap to.
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