बात उन दिनों की जब मोहब्बत बस हो जाया करती थी। लगभग 12 साल पीछे चल दीजिये, तो वो दौर था जब वो स्कूल में थी, अच्छी, बहुत अच्छी स्टूडें...

बात उन दिनों की जब मोहब्बत बस हो जाया करती थी। लगभग 12 साल पीछे चल दीजिये, तो वो दौर था जब वो स्कूल में थी, अच्छी, बहुत अच्छी स्टूडेंट।

और मै लास्ट बेंच पर बैठकर बस एक ही गाना गुनगुनाता था “चाहा है तुझको, चाहूँगा हरदम ....”
सुबह-सबेरे अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ साईकल से रोजाना ट्यूशन पर जाती थी । उस दिन उसे उसकी साईकल के कैरियर पर एक फूल मिला। विशेष ध्यान न देते हुए उसे एक ओर रखा, साईकल उठायी और चली गयी घर की ओर।

दिल को थोडा सा बुरा जरुर लगा था ...! लेकिन इस सिलसिले को मै रुकने नहीं देना चाहता था !

..........गुलाब, गुड़हल, डहलिया, सूरजमुखी, यहाँ तक की कनेर क्यों न हो, पर उसकी साईकल पर रखता जरूर था।

5-7 दिन गुजर गए थे, दोस्त जी भर चिढ़ाते। नयी उम्र का नया शगल था, अच्छा लगता मुझको भी। पर वो दिन यूँ आज की तरह तो थे नहीं। इसलिए मन ही मन घबराते भी।

अब फूल स्कूल की बेंच तक उसके आने के पहले ही रख आता था.......।

उसने और उसकी दोस्त ने महसूस किया, कि अब स्कूल छूटने पर कोई पीछे-पीछे उसकी गली तक छोड़ने आता है पर पीछे मुड़ कर देख ले, ऐसा कालेजा न जुटा सकी वो .............!

अब बेचैनी का दौर आ गया था। बड़े नासाज तबियत से हम घूमते।

पढ़ाई लिखाई से दिल कब का उचट गया था। मोहब्बत छोड़िये साहब, बात पिछले ज़माने की थी। तब लड़की गेट पे भी खड़ी हो जाये तो पड़ोस की आंटियाँ आँखे ततेर के देखती थी।.......और फिर जब उसकी साईकल से थोड़ी दूर पर मै होता था तो उन आंटी लोगों का कहना ही क्या ........!

इधर काफी दिन से वो ट्यूशन और स्कूल नहीं आई थी .......... दिल बड़ा बेचैन होने लगा था ......!
खैर कब तक। फिर उसी दिनचर्या में वापस।

मुरझाये से चेहरे के साथ हम उस रोज भी साईकिल में पैडल मारते हुए जा रहे थे। ठण्ड के दिन थे। सुबह 6 बजे सड़क पर कोहरा पसरा पड़ा था।

अचानक सड़क के बीचों-बीच दुबली पतली काया आती हुई दिखाई दी ।
मै बोला, "मैं हूँ..तुमसे बात करनी है।"
उसे उसकी दोस्त ने हौसला और स्वीकृति दी।

मिनटों ख़ामोशी रही वो फिर.............
मेरी तरफ से .......

एक फूल, चंद लफ्जो में मोहब्बत की बयानबाजी, माफ़ी की दरकार और एक अदद कागज का पन्ना और फिर दोबारा न परेशान करने का आश्वासन।
वो बस नजर झुकाये ही रह गई।
सहेली की आवाज ने उसकी विचारशीलता को तोडा।

हाथ-पैर नार्मल से ज्यादा ठन्डे महसूस हुए और चाह कर भी जुबां हिली ही नहीं उसकी ।

.........मैंने भी बगैर जवाब का इंतजार किये अपना फैसला सुना दिया, कि जो भी हो तुमसे ही प्यार है और रहेगा। बाकि परेशान नहीं करूँगा अब।

दो-चार रोज बीत गए इस वाक़ये को। पर ये क्या? अब उसे भी कुछ सालने लगा। कुछ अधूरापन सा था। उसकी साईकिल की रफ़्तार कुछ धीमी हो जाती उस रोड पर। हाँ, शायद मेरा उसका पीछा करना... फूल रखना... भेजवाना... छुप के देखना... सब बहुत मिस करने लगी थी वो ........।
अचानक किसी चीज का आदत में तब्दील हो जाना। फिर अनायास ही बंद हो जाना। इस तरह से कमी शिद्दत से महसूस करवाएगा मुझे अंदाजा नहीं था।

अगले कुछ दिनों में आस-पास सब कुछ बेगाना हो चला। 'हिंदी-इंग्लिश' को तो हम हलके में ही लेते थे, 'केमिस्ट्री' कहीं उलझ गयी थी, 'बायोलॉजी' ये थी कि उसके जिक्र से ही दिल की रफ़्तार तेजी पकड़ लेती और 'फिज़िक्स' के एवज में आँखे उसकी फ़िजिक कहीं दिख जाये इसी का इन्तेजार करती।

कुल मिला कर उम्र के उस नाजुक दौर में हमारी सीधी सादी जिंदगी के सब सब्जेक्ट उसी के मार्किंग के भरोसे हो गए। अब शून्य में विचार चलते। दोस्त छेड़ते तो बड़ी अदा से मुस्कुराते और मैडम को देखते तो मुंडी नीचे। फूलों से बरसों का सानिध्य महसूस होता। और कभी कभी शाम को भी उसी ट्यूसन वाले रस्ते पे निकल लेते।.........

अचानक सलीका सीख गए थे हम दोनों ........., उसके आँखों में काजल ने जगह बना ली और कपड़ों के चॉइस और कलर भी मैटर करने लगे थे........।

स्कूल के बाद बस स्टॉप पे घंटो मुझे इल्म रहता, कि एक जोड़ी आँखे मुझे देखती होंगी।
पर वो, उसका कही पता नहीं था। और मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता था।
एग्जाम ख़त्म हो गए और .................... इस बार आलम दूसरा था।

हमारी तबियत भी आशिक़ो-सा रवैया अपनाये हुए थी इस बार। वही ट्यूसन वाला रास्ता था और सड़क किनारे कुछ झाड़ियों की ओट। घंटे भर खामोश खड़े रहे। बिना शर्त का इक खामोश रिश्ता उन दिनों जी रहे थे, हम दोनों ही।
वो दूसरी ही मुलाक़ात थी।

मेरा उसके कंधे से एक चीटीं हटाना हजारों तितलियों के लम्स जैसा हो गया था। वो पत्ते सी कांप गयी। "तुम ठीक तो हो" का एक ठहराव हमारी ख़ामोशी में आ गया था। "तुम आगे पढ़ने बाहर जा रही हो। तुम अच्छे से जाओ और पढ़ो। बस तुमसे प्यार है तुम्हारे फ्यूचर के बीच मैं नहीं आऊंगातुम्हारा जबाव भी नहीं चाहिए मुझे.........."
बहते आसुओं के बीच वो मेरी ख़ामोशी मेरे अंदर जहनी शोर मचा रही थी।

उसको भी लड़की होने का अहसास इतन सख्त था , कि शर्म और असहजता की पतली रेखा पार ही न कर सकी । उसके आंसू कुछ तो जवाब दे ही चुके थे।

पर अब तक चल दिया था, मै पीछे मुड़ कर..............

न फ़ोन का जमाना था न ईमेल का, दुनिया की भीड़ में मोहब्बत का पहला प्रपोजल खो गया।

अब वो प्रेम था या उम्र के सफ़र का इक नाजुक दौर, इसका विश्लेषण हम कभी कर ही न सके।

12 साल बीत गए पर आज भी वो खामोश तमन्नाये अंतर्मन में उतनी ही ताजगी से शोर कर जाती है। और हम बस मुस्कुरा उठते है, कि अजब दौर था... स्कूली चाहतें ऐसे ही बेमतलब पर शिद्दती अहसाह वाली होती थी।

#प्रदीप

यह बात उन दिनों की हैं जब मैंने अपना बीकॉम पूरा करके बैंक के कॉम्पटीशन एग्जाम की तैयारी के लिए एक कोचिंग इंस्टिट्यूट में एडमिशन लिया ...


यह बात उन दिनों की हैं जब मैंने अपना बीकॉम पूरा करके बैंक के कॉम्पटीशन एग्जाम की तैयारी के लिए एक कोचिंग इंस्टिट्यूट में एडमिशन लिया । मैं पढ़ने में पहले से ही अच्छा था और अभी भी अपने "बैंक में नौकरी" करने के सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा हूँ। मैं अक्सर ऑटो से कोचिंग जाया करता था... लेकिन एक दिन मैं अपने दोस्त के साथ उसकी बाइक से लौट रहा था तब मेरी नजर एक ऑटो में बैठी एक लड़की पर गयी ... जिसका चेहरा तो मैं नहीं देख पाया क्योंकि उसने सफ़ेद कपड़े से अपना चेहरा ढका हुआ
था.....



लेकिन उसके पतले और गोरे गोरे से क्यूट से हाथ देखकर अच्छा सा महसूस हुआ मुझे नही पता था कि ये मेरे साथ पढ़ती हैं.. और कुछ दिन में मैं इस बात को भूल गया ।




फिर एक दिन जब वो मेरे पास वाली सीट पर बैठी थी तो मैंने उसको कुछ ध्यान से देखा तभी मुझे वो ऑटो वाली घटना का स्मरण हुआ क्योंकि उसको देखकर वही पतले पतले और गोरे गोरे क्यूट से हाथ याद आये और मैंने उसका मासूम सा चेहरा भी देख लिया था उस दिन ।





अब कन्फर्म करने क लिए क्लास खत्म होते ही मैं बाहर आकर ऑटो का इंतजार करने लगा जबकी वो इंतजार उसका था तभी वो पीछे से आई और मेरे बराबर में खड़ी होकर ऑटो का इंतजार करने लगी और हम दोनों एक ही ऑटो से घर आये और उसने ऑटो में बैठकर अपना चेहरा ढक लिया उसी सफ़ेद कपड़े से... अब मुझे यकीन हो गया था की ये वही हैं जिसको कुछ दिन पहले देखा था । उसका घर मेरे घर के रस्ते में ही पड़ता था लेकिन उस दिन मैंने उस से कुछ बात नही की , करता भी तो क्या मुझे तो उसका नाम तक नही पता था।




इस तरह वक़्त बीतता गया हम दोनों अक्सर साथ में ही एक ही ऑटो से घर आते रहे और नजरो से नजर का संपर्क भी हुआ लेकिन एक दूसरे से कभी कुछ बोल नहीं पाये।



फिर एक दिन वो आया जब हमने कोचिंग में ही अपने स्पीड टेस्ट के वक़्त एक mutual फ्रेंड के माध्यम से एक दुसरे से पढाई के बारे में बात की। रोज की तरह उस दिन भी हम साथ में ही घर आ रहे थे और मैंने उसको अपने रीजनिंग के नोट्स दिए और जब वो ऑटो से उतर कर जाने लगी तो मैने bye बोला उसने भी बड़े स्वीट से तरीके से bye बोला या यूँ कहिये उसकी आवाज सुनकर मेरे मन का रोम रोम खिल उठा इतनी प्यारी आवाज थी उसकी। नोट्स तो दे दिए थे पर नाम तो अभी तक नही पता था मुझे उसका।



अगले दिन जब वो आते वक़्त मिली तो मैंने उसको hii बोला जवाब में उसने भी एक प्यारी स्माइल के साथ रेस्पांस दिया। उसने कहा काफी अच्छे नोट्स हैं ले लेना एक दो दिन में , मेहनत दिख रही हैं उनमें.. मैंने भी थैंक्स बोला और कहा मुझे तो आपका नाम भी नही पता तो उसने बोला - "काव्या"



तभी मुझे अचानक याद आया कि ये नाम तो सिंघम मूवी में काजल अग्रवाल का था जो की मुझे बहुत प्यारा लगा था ...मैंने उसको बोला नाम तो काफी अच्छा हैं। उसने भी एक हँसी के साथ थैंक्स बोला।



अब मैं उससे और बात करना चाहता था , घर आकर मैंने फेसबुक पर उसको सर्च किया लेकिन वो मुझे नही मिली...अगले दिन मैंने उससे उसके फेसबुक अकाउंट के बारे में पूछा...उसके चेहरे के हाव भाव से लगा जैसे वो बताने नही चाहती थी...मैंने बोला क्या हुआ मुझे add नही करना ..जवाब आया - ऐसा कुछ नही हैं.. मैं ज्यादा यूज़ नही करती फेसबुक और उसने अपना यूजर अकाउंट बता दिया..उस दिन भी बात नही हो पायी फेसबुक पर.. फिर जब होनी स्टार्ट हुयी तो तब भी हमारी बाते पढाई तक ही सीमित रहती थी लेकिन ये भी था क़ि कभी



कभी मैं उसको इधर उधर की बातो में लगा ही लेता था...



धीरे धीरे बातो का सिलसिला आगे बढ़ता गया और मैं कई बार कुछ बोलने के बाद कहता था कि गलत मतलब नही समझना मेरी बातो का.... और जब यकीन हो जाये तो अपना व्हाट्सअप नंबर दे देना.. एक दिन वो बोली कि अपना व्हाट्सअप नंबर दो.. और गलत मतलब मत समझना, बस पढाई से रिलेटेड बातो के लिए ही नंबर ले रही हूँ... मैंने भी हँसकर कहा - वैसे ये मेरी लाइन हैं।



इसी बीच मेरा जन्मदिन आने वाला था.. और मैं उसके साथ वक़्त बिताना चाहता था..इसलिए मैंने उसको बोला कि जन्मदिन पर मूवी या रेस्टॉरेन्ट चलते हैं.. उसने मना किया तो मैंने कहा कि चल लेना न.. पास में ही हैं रेस्टॉरेन्ट.. तो उसने कहा कि देखेते हैं.. वैसे मूवी भी जा सकते हैं।



अब मैंने भी सोच लिया था कि जाना तो अब मूवी ही हैं।



जन्मदिन वाली रात १२ बजने से पहले ही मैंने बोला कि मूवी चलना हैं कल। मना करने लगी और गुस्सा होकर ऑफलाइन हो गयी। फिर रात को १२ बजे उसने मुझे जन्मदिन wish किया और बोली - क्या प्लान हैं कल का।
मैंने कहा मूवी जाना हैं, तो बोली ठीक हैं चलते हैं कल मूवी। और हम अच्छे दोस्त की तरह पहली बार मूवी गये।



उस दिन पहली बार मैंने उसका हाथ पकड़ा एक दोस्त की तरह..वाकई में काफी सॉफ्ट सा महसूस हुआ ।
मैंने तो मूवी ठीक से देखी भी नही.. बाते बनाता रहा बस.. फिर जब इंटरवल हुआ तो मैं कॉफ़ी लेकर आया और थोड़ी सी पीने के बाद बोला कॉफ़ी शेयर करते हैं एक दूसरे की क्योंकि हम बहुत लड़ाई करते हैं और हमने अपनी कॉफ़ी शेयर की।




उस दिन उसने काफी कुछ बताया अपने बारे में..अपनी फैमिली के बारे में। वक़्त का तो पता ही नही लगा उस दिन.. लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि ये जन्मदिन मेरा अब तक का सबसे अच्छा जन्मदिन हैं..



 मैं पढ़ाई में अक्सर उस वाइल्ड कैट की हेल्प करता था , अभी भी करता हूं.. लेकिन अब वो भी सब कुछ सीख गयी हैं। वाइल्ड कैट इसलिए क्योंकि वो मेरे से बहुत लड़ाई करती थी छोटी छोटी बात पर...वैसे दोनों ही करते थे। जो भी हो लेकिन मैंने उसका नंबर अपने मोबाइल में wild cat के नाम से save करा हुआ था और एक दिन जब वो किसी बात पर लड़ाई कर रही थी तो मैंने उसको wild cat के नाम से save करे हुए उसके नंबर का स्क्रीन शॉट व्हाट्सएप्प पर भेज दिया.. वो और ज्यादा गुस्सा हो गयी तो मैंने बोला की काव्या के नाम से ही कर लिया हैं नंबर save. कुछ देर में बोली - वैसे अच्छा था नाम - WILD CAT और उस दिन से वो मेरे लिए जंगली बिल्ली हो गयी।




हम दोनों व्हाट्सएप्प पर स्टडी से रिलेटेड डिस्कसन करते थे। हमारी कोचिंग लगभग खत्म ही हो गयी बस कुछ ही क्लास बची हुयी थी ...बारिश का मौसम था.. मैंने बोला- काव्या आज नही जा रहे बारिश हो रही हैं उसने जिद् की और हम दोनों जाने लगे पढ़ने। लेकिन जाते समय मेरा लेनोवो मोबाइल ऑटो से गिर गया कही.. पता ही नही लगा की कैसे गिर गया.. और मेरी जंगली. बिल्ली को जब पता लगा की मोबाइल गिर गया हैं तो कॉल की एकदम से ..कॉल जाती रही लेकिन रिसीव नही करा किसी ने...।




काफी कोशिस के बाद भी मोबाइल नही मिला तो मैंने भी सोच लिया कि अब गया तो गया...क्या कर सकते हैं.. तभी वो sad होकर कहने लगी की ये सब मेरी वजह से हुआ हैं , मैंने ही आज आने के लिए जिद् की , अगर हम नहीं आते तो आज ऐसा नहीं होता । उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ की ये रिअक्ट ही rude सा
करती लेकिन अंदरुनी मन से काफी इमोशनल हैं।



मैंने उसको समझाया की कोई बात नही मोबाइल ही तो था नया ले लेंगे और ऐसे  नही कहो ..तुमसे ज्यादा थोड़ी था मोबाइल। लेकिन कुछ देर बाद उसके मोबाइल पर मेरे नंबर से कॉल आयी.. हमने जल्दी से कॉल रिसीव की..एक अंकल बोल रहे थे ..उन्होंने कहा बेटा आपका मोबाइल गिर गया था आकर ले जाओ..और मैं जाकर ले आया..काफी अच्छे थे वो अंकल..वरना कौन आज के टाइम में कुछ वापस करता हैं.. मोबाइल वापस मिलने के बाद वो कहने लगी.. देख लो.. मैं लकी हूँ तुम्हारे लिए वरना मिलता नही मोबाइल.. मैंने भी एक हँसी के साथ हां बोला।




अब हम दोनों अच्छे दोस्त की तरह सब बात एक दूसरे से शेयर करते थे।लड़ाई भी करते थे..हँसी ,मजाक, काफी अच्छा था उन दिनों का माहौल.. एक बार तो मेरे को सपना भी आया की उसने मुझे आकर कहा आर्यन मुझे शॉपिंग जाना हैं मेरे साथ चलो..। मैंने बताया तो..काफी हँसी वो ..और कहने लगी हां..तुमको ही तो लेकर जाउंगी मैं शॉपिंग.. मुझे चिढा रही थी..लेकिन कुछ देर बात उसने स्टेटस लगाया- चीटिया कलैया..वे.. के मैनू शॉपिंग करा दे.. और हँसके बोली स्टेटस देख लो.. मुझे भी बड़ी अचछी फीलिंग आयी।



हम दोनों अब तक एक दूसरे के बारे में काफी कुछ जान गए थे..काफी ज्यादा बाते करते थे ..रात को १२ बजे तक पढ़ने के बाद थोड़ी देर व्हाट्सएप्प पर बात करके सोते थे। सब कुछ अच्छा चल रहा था..लेकिन उसके घर पर उसकी बुआ जी और दादी जी आई हुयी थी इसलिए वो काफी व्यस्त थी और मेरे से बात नहीं कर पायी थी..मुझे बुरा feel हो रहा था।मुझे लगा कि वो मेरे को इग्नोर कर रही हैं.. और फिर जब वो ऑनलाइन आयी.. मैंने बात की..काफी परेशान था मैं.. और मैंने कह दिया.."I M in LOVE" वो कुछ नही बोली..मैं जानता था की रिप्लाई नेगेटिव आ सकता हैं इसलिए मैंने ऐसा कहा और मैं जवाब के लिए भी तैयार था.. वो कुछ जवाब नही दे रही थी..मैंने कहा.." I will treat you always like a Princess "



 उसने कहा -I know Aryan, I know तुम मुझे Princess की तरह ट्रीट करोगें..



But I can't.. , I don't deserve u and मेरी फैमिली काफी नैरो माइंडेड हैं... और वो इंटरकास्ट मैरिज के लिए कभी नहीं मानेगे ... और मैं व्हाट्सएप्प बन्द कर रही हूँ.. यही ठीक होगा अब हम दोनों के लिए। इतना
कहकर उसने अपना व्हाट्सअप अकाउंट डिलीट कर दिया।



उस रात मैं ठीक से सो भी नही पाया..और शायद वो भी..क्योंकि मैं इतना तो जानता था कि वो भले हे मुझसे प्यार नही करती हो लेकिन कही न कही वो मुझे पसन्द तो करती हैं..



उस रात काफी बारिश भी हुयी..हमारी कोचिंग खत्म हो गयी थी..इसलिए मिलने का भी कोई चान्स नही था।
मैं जब सुबह उठा तो काफी बारिश हो रही थी..बाहर देख कर लगा कि ये आसमान भी मेरे मन की तरह रो रहा हैं। सुबह सुबह फीलिंग को कंट्रोल करना मेरे लिए हमेशा से ही बहुत मुश्किल रहा हैं फिर वो चाहे कोई दुःख की बात हो या फिर ख़ुशी की।



मन में भावनाओ का फव्वारा इतनी तेजी से बहने लगा की मैंने काव्या को कॉल की।



जब उसने कॉल रिसीव करके hello बोला..उसकी आवाज मे एक दर्द सा महसूस हुआ..मैंने उसको फिर बहुत आराम से समझाया कि - क्या फर्क पड़ता हैं अगर हम अलग अलग कास्ट के हैं.. कोई किसी को पसन्द या प्यार किसी की जाती देख कर थोड़ी करता हैं.. और तुम तो काफी समझदार और पढ़ी लिखी हो फिर भी ऐसी बाते कर रही हो । क्या तुम भी ये जाती धर्म में विस्वास करती हो ?



उसने कहा कि - नहीं, मैं ये सब बाते नही मानती लेकिन आर्यन सब कुछ देखना पड़ता हैं.. और मैं तुमको अच्छे से जान तो गयी हूँ लेकिन अभी थोड़ा और वक़्त चाहिए.. मैंने कहा ठीक हैं.. ले लो जितना टाइम भी लेना हैं.. और फिर 20 दिन बाद उसने "I love you too" कहा।



और बोली आर्यन मैं भी तुमको खोना नहीं चाहती लेकिन मैं अभी कोई प्रोमिस नही कर सकती फ्यूचर का। मैंने भी बोला कि कोई बात नहीं जो भी होगा देखा जायेगा लेकिन आने वाले कल के डर की वजह से हम अपना आज का वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते।



आज हम दोनों साथ हैं.. इस उम्मीद के साथ की जो भी होगा देखा जायेगा..बाक़ी लड़ाई , झगड़ा, रूठना , मनाना तो चलता रहता हैं लेकिन दोनों में से कोई भी एक दूसरे से ज्यादा देर तक गुस्सा नहीं रह पाता।

अक्सर हम दोनों ही एक दूसरे के मन की बातो को ज्यादातर बिना कहे ही समझ जाते हैं। सब कुछ अच्छा हैं अब.. लेकिन मेरे मन में जब भी ख्याल आता हैं कि अगर हम अलग हो गए फैमिली की वजह से तो कैसे एक दूसरे के बिना रह पायेगे।


लेकिन फिर भी मन में एक विश्वास हैं कि one day my wild cat will be mine forever..

काव्या... बहुत सारा प्यार करता हूँ मैं आपसे..और आपके बिना..लाइफ के बारे में सोचने से भी मेरी रूह काँप जाती हैं..


मैं बस एक प्रोमिस चाहता हूँ..कि फ्यूचर में जो भी होगा..साथ में मिलकर
देख लेंगे न दोनो...I will not back out just want u and I will treat u always like a Princess.
Love uh..mine जंगली बिल्ली।




Writter- NITIN YADAV

“हेल्लो मिस्टर आप देख कर नहीं चल सकते क्या”? “वैल आय ऍम सॉरी मिस , इट वास् नॉट माय फौल्ट. यू शुड हैव सीन प्रोपरली हियर एंड देयर व्ह्...

“हेल्लो मिस्टर आप देख कर नहीं चल सकते क्या”?

“वैल आय ऍम सॉरी मिस , इट वास् नॉट माय फौल्ट. यू शुड हैव सीन प्रोपरली हियर एंड देयर व्ह्यल चैटिंग ऑन योर फ़ोन.”

“एक्सक्यूज़ मी!”

“यू आर एक्सक्यूज़ड.”



              
नंदिनी चौंक गई थी एक कस्बाई जगह पर इस तरह से अंग्रेजी बोलते हुए किसी लड़के को, मोबाइल फ़ोन पर चैटिंग करती जा रही नंदिनी अचानक से एक लड़के से टकरा गयी और ये ३-४ संवाद उसके मन को अन्दर तक झंझोड़ गए. रात भर वो सो न सकी. उस लड़के का एटीट्युड उसे कहीं न कहीं चोट पंहुचा कर भी उसके दिल में थोड़ी जगह बना रहा था. आज तक किसी ने उससे इस तरह से बात नहीं की थी न ही पलट कर ऐसा जवाब दिया था. उसके मित्र गण अकसर उसकी प्रशंसा करते और वो फूली न समाती. मगर आज ऐसा क्यों हुआ था कि उस लड़के ने उसे मुड़कर नहीं देखा. नंदिनी यह सब सह नहीं पा रही थी एक देहाती लड़का उसे उसकी गलती बता कर चला गया और वो कुछ भी नहीं कह सकी. यह सब सोचते हुए रात के 1 बज गए. आसमान में चाँद बादलों के साथ लुकाछिपी खेल रहा था मगर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी. 

गेहुआं रंग, बड़ी बड़ी आँखें, तीखी सुतवा नाक, करीने से कटे हुए बाल, सदी चेक शर्ट और जीन्स पहने हुए तकरीबन ५’८-५’९ कद के व्यक्तित्व और एंग्री यंग मन लुक ने नंदिनी को उसका कायल बना दिया था. उसका जादू नंदिनी के दिल को अपने काबू में करने का भरसक प्रयास कर रहा था और शायद सफल भी हो चुका था.  



“उठ जा बेटा, देख 11 बज रहे हैं. आज से पहले तो तू इतना कभी नहीं सोयी”, प्यार से नंदिनी के बालों में हाथ फेरते हुए दादी माँ ने कहा. “प्लीज आज सोने दीजिये न दादी माँ कितना रोमांटिक सपना देख रही थी मैं, आपने खामखांह मेरी नींद ख़राब कर दी”, लड़ियाते हुए नंदिनी ने फिर से आँखें बंद कर ली.

नंदिनी अपनी दादी माँ के पास एक हफ्ते के लिए रहने आई थी. बचपन को दुबारा जीने की ललक उसे फिर से उन खेतों, बाग़-बगीचों में खींच लायी थी जहाँ हर साल उसकी बचपन की गर्मियों की छुट्टियां दादी माँ के हाथ के बने स्वादिष्ट आलू के परांठे, मक्खन और ताज़ा दूध दही की खिलावट में ख़तम होती थी. नौकरी लगने के बाद वह तनावपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थी, कि उसने कुछ दिन की छुट्टी लेकर दादी माँ के आँचल की छाँव में रहकर सुकून भरे पल बिताने का फैसला किया.


“अम्मा ... अरे कहाँ हो अम्मा”? 
“अरे बेटा तुम! कब आये दिल्ली से”? 
“जी कल सुबह ही आया, रास्ते से गुज़र रहा था. आपके घर से कुछ पकने की खुशबू दूर से ही आ रही थी. बस सूंघता हुआ सीधा आपके पास आ गया.” 




बहुत अच्छा किया ... मेरी पोती आई हुई है उसके लिए शाही पनीर बना रही थी. ठहरो, तुम्हारे लिए भी लेकर आती हूँ”. 




“जी अम्मा”


सागर हर साल होली पर अपने मामा मामी के घर आता था, यहाँ की होली में उसे वो मिठास और रंग मिलते जिसकी दिल्ली जैसे महानगर में कमी थी. वहां न कोई रौनक न हुडदंग, बस औपचारिकतायें निभाते हुए सोसाइटी के लोगों के गुलाल लगा कर हैप्पी होली कहना और कुछ नही.

 “कोई आया है क्या दादी माँ”?, नंदिनी ने रसोईघर में घुसते हुए सवाल किया. “हाँ बेटा पड़ोस का एक लड़का आया है”, दादी माँ ने खाना परोसते हुए कहा. “यह शाही पनीर उसके लिए ही लेकर जा रही हूँ”, दादी माँ ने मुस्कुरा कर प्यार से नंदिनी का गाल थपथपाया. “दादी माँ कोई लड़का आया है या आपका बॉयफ्रेंड ... शायद दादी माँ को शादी का ख्याल दिल में आया है , इसीलिए दादी ने मेरी किसी को खाने पे बुलाया है , आँख मारते हुए नंदिनी ने गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया. “चुप कर बेशरम लड़की, कुछ भी बोलती है. पता नहीं आजकल के बच्चों के संस्कार कहाँ चले गए. बेहूदा मजाक करते हुए एक बार भी नहीं सोचते”, गुस्से में बडबडाते हुए दादी माँ रसोई से बाहर निकल गयी.

“सॉरी दादी माँ”, नंदिनी चिल्लाई. 



दादी माँ से कोई प्रतिउत्तर न मिलने पर वह बहार बैठक की तरफ आ गयी और सामने सागर को देख कर ठिठक गयी. उसके दिल की धड़कन अचानक से तेज़ हो गयी. असहज सी नंदिनी ने सागर को नज़र अंदाज़ करने का अभिनय करते हुए दादी माँ पर नाहक ही बिफरने का प्रयास किया. 
“दादी माँ मुझे बहुत भूख लगी है, प्लीज कुछ खाने को दो ना” 




“अभी लाती हूँ, मगर पहले इससे मिलो. यह सागर है, रमेश काका का भांजा. बहुत ही मेहनती और कर्मठ लड़का है, कठिन परिस्थितियों में भी खुद को संयमित रख कर दिल्ली में एक बहुत अची नौकरी पर लगा हुआ है”. 




“यह सब सुनकर नंदिनी का रुझान सागर की तरफ और भी बढ़ गया. दोनों ने एक चिर-परिचित मुस्कान एक्सचेंज की फिर बातों का सिलसिला चल पढ़ा. फिल्म, एक्टर-एक्ट्रेस, पर्यटन स्थल, जॉब, करियर क्या क्या बातें नहीं की दोनों ने. जब सागर मुस्कुराते हुए अपने बालों में हाथ फेरता तोह नंदिनी के पेट में तितलियाँ मोहिनीअट्टम करने लगती. अब वह हँसता तो नंदिनी का दिल गुनगुनाता “सैंया दिल में आना रे, आके फिर न जाना रे”. वह चाहती थी यह खुशगवार पल यहीं थम जाये, सागर को हँसते बोलते हुए उसकी भूरी-भूरी आँखों में टकटकी लगा कर अपनी तस्वीर देखे. सिर्फ 10-15 मिनट के लिए दादी माँ से मिलने आया सागर शाम के 5 बजे अपने घर लौट रहा था.



रात के 11 बज रहे थे. चांदनी रात में नंदिनी गुनगुना रही थी “तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया, पिया पिया बोले मतवाला जिया”. उसके गुलाबी होठों पे बरबस मुस्कान मौजूद थी. सैकड़ो प्यार भरे गाने उसकी जुबां से खुद-ब-खुद निकले जा रहे थे. 





हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई ज़िन्दगी चाहता हो जैसे



तेरा मिलना पल दो पल का मेरी धडकनें बढ़ाये , डर है मुझे प्यार तेरा मेरी जान ले ले न जाये


क्योंकि तुम ही हो अब तुम ही हो, ज़िन्दगी अब तुम ही ह





मुस्कुराने की वजह तुम हो, गुनगुनाने की वजह तुम हो गुनगुनाते हुए कब रात के 2 बज गए पता ही नहीं चला.... 80, 90 का दशक और 21वी सदी का सफ़र उसने कुछ घंटो में ही तय कर लिया था. लता मंगेशकर से लेकर. सोनू निगम और कब अरिजीत सिंह तक पहुची वह खुद भी अनजान थी.


“दादी माँ” 
“हम्म” 
“उम्म्म, सागर दिल्ली में जॉब करता है न”? 
“ह्म्म्म क्यों”? 
“दादी माँ, मैं रमेश काका के घर चली जाऊ”? मैंने बहुत सालों से नहीं देखा उन्हें. पहले वह हमारे खेतों की देखभाल किया करते थे. मैं कितना तंग किया करती थी न उन्हें दादी माँ. आपको याद है एक बार मैंने उन्हें टूटी कुर्सी पे बिठा दिया था... और वह धडाम से गिरे थे”, कहते कहते नंदिनी ठहाके मार कर हंसने लगी. 
“बद्तमीज़ तो तू शुरू से रही है. अपनी पिटाई याद है य भूल गयी”, इस बार दादी माँ ने चुटकी ली. 




“अच्छा बस बस”, झूठा गुस्सा दिखाते हुए नंदिनी बोली. “मैं सोच रही थी सागर से भी नयी जॉब के बारे में डिस्कस कर लूं”, कहते हुए नंदिनी थोडा सकपकाई. 




“हम्म चली जा... और सुन मैंने खीर बनायीं है आज, वह भी लेती जाना”. 
नंदिनी के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. तैयार होने वह ऐसे भागी जैसे ओलम्पिक प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल हासिल करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य है.



आधे पौने घंटे के श्रृंगार के बाद नंदिनी तैयार थी. आईने में खुद को देख कर उसने फिर से अपने सौंदर्य पर गर्व महसूस किया. कोई भी लड़का उसके हुस्न के मोह-पाश से नहीं निकल सकता, सागर को भी मंत्र-मुग्ध होना ही पढ़ा. आसमानी रंग के सूट और माथे पर छोटी सी बिंदी लगाकर वह और भी अधिक खूबसूरत लग रही थी. दादी माँ ने ही कहा था उसे कुछ पारंपरिक पोशाक पहन कर जाने को. सूट से मेल खाती चूड़ियाँ और कानों के कुंडल पहन कर जब वह कमरे से बाहर आई तोह दादी माँ ने उसका माथा चूम कर काला टीका लगा दिया.

खिली खिली धूप में पगडंडियों पर अपने कदम नापती हुई नंदिनी सागर के बारे में सोच सोचकर ही रोमांचित हुए जा रही थी.  
“काका!... कोई है??“, नंदिनी ने रमेश काका के घर पहुच कर आवाज़ लगाई. परन्तु कोई उत्तर न मिला. “काकी.... काकी.... “ इस बार उसे किसी की पायलों की झंकार सुनाई दी. काकी के बारे में सोचते हुए उसने अपने गुलाबी-आसमानी दुपट्टे को कंधे से फैला लिया. 



“जी बोलिए”, दरवाजा खुलने पर भीतर से एक लाल और गहरी नीली साड़ी पहने एक स्त्री ने पूछा. 
एक लड़की को काका के घर पर नंदिनी सोच में पढ़ गयी. “रमेश काका से मिलना था”, नंदिनी ने हिचकिचाते हुए कहा. 




“अन्दर आइये प्लीज”, लड़की ने आदरभाव जताते हुए कहा. 
नंदिनी ने चुपचाप घर के अन्दर प्रवेश किया. घर के अन्दर एक नज़र डाली. सब कुछ काफी बदल चुका था. खुले आँगन को पाट दिया था. दीवारें भी पक्के फर्श की नींव पा कर मजबूती से खडी हुई मालूम पढ़ रही थी. काका का घर अब निम्न वर्गीय से उठकर निम्न मध्यम वर्गीय की श्रेणी में आ चुका था. 
“मेरी दादी माँ ने खीर भिजवाई है”, अल्प मौन तोड़ते हुए नंदिनी बोली. 




“थैंक यू वैरी मच . लड़की के स्वर में आत्मीयता के साथ अंग्रेजी ज्ञान की अच्छी पकड़ दिखाई दी. “घर के सभी लोग किसी काम से शहर गए हैं, शाम तक लौटेंगे. आपको कोई ज़रूरी काम था तो आप मुझे बता दीजिये, आय विल कन्वेय योर मेसेज”, खीर का डोंगा साइड टेबल पर रखते हुए उसने कहा. 




“आप सुलेखा हैं क्या? माफ़ कीजिये मैं काफी सालों बाद यहाँ आई हूँ तो चेहरे पहचानने में मुश्किल हो रही है. आय होप यू डोंट माइंड दिस , नंदिनी ने गौर से लड़की के चेहरे को देखते हुए प्रश्न किया. 
“नो नॉट एट ऑल , सुलेखा दीदी मामा जी की बेटी हैं. मैं तो इस घर की बहू हूँ”, मुस्कुराते हुए लड़की ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया और रसोईघर की तरफ चली गयी. नंदिनी का मन उसके दिल से हजारो प्रश्न दाग रहा था. थोड़ी देर बाद वह एक ट्रे में पानी और कुछ मिठाई, गुझिया, नमकीन आदि लाती दिखी. 




“आप कौन हैं? आय मीन रमेश काका का तो कोई बेटा नहीं है न”, पानी का गिलास उठाते हुए नंदिनी ने फिर एक प्रश्न किया. 




“मेरा नाम जाह्नवी है, आपके रमेश काका मेरे हस्बैंड के मामा जी हैं” 
यह सुनते ही नंदिनी की आँखों के आगे अँधेरा छा गया. खुद को सँभालते हुए उसने स्वर को धीमा करते हुए पुछा, “सागर की पत्नी हो”? 




“हाँ मगर आप सागर को कैसे”?? 




“कल सागर मेरी दादी माँ के घर आये थे, वहां उनसे....”, नंदिनी ने आगे कुछ न कह कर वाक्य को वहीँ विराम दे दिया. बहुत ही औसत रंग रूप लगा नंदिनी को जाह्नवी का. न चेहरे पर कोई आकर्षण न ही चाल ढाल में कोई अदा. 




“अरेंज्ड मैरिज?”, पूछते हुए नंदिनी ने खाँसने का अभिनय किया ताकि जाह्नवी कोई गलत प्रतिक्रिया न दे पाए. 




“नो , इट्स अ लव मैरिज , हँसते हुए जाह्नवी बोली. नंदिनी से किसी तरेह की प्रतिक्रिया न पाकर उसने फिर कहा, “अभी एक साल ही हुआ है हमारी शादी को. पहले साथ काम करते थे और अब साथ में रहते भी हैं”. 




नंदिनी को उसका हँसना मुस्कुराना इस कदर नागवार गुजर रहा था कि उसने वह से तुरंत जाने का निर्णय किया. “अच्छा मैं चलती हूँ, फिर कभी आउंगी”, बनावटी मुस्कराहट के साथ नंदिनी ने फिर से एक बार जाह्नवी के चेहरे को परखने की कोशिश की. सागर कैसे इसकी तरफ आकर्षित हो गया की ब्याह रचा लिया. यह सवाल उसके मन में बुरी तरह कौंध रहा था. मेरे सामने तो यह जाह्नवी कहीं भी नहीं टिकती. सोचते हुए वह अपने दिल में नफरत की आग लेकर बाहर निकल गयी.




घर आकर वो आक्रोश से भरी हुई थी. एक-एक करके उसके ज़हन में सवालों की बरसात होने लगी. क्यों गयी वह वहां? क्या सोच कर गयी थी? सागर झूठा और धोखेबाज़ इन्सान निकला. ऐसे नीच आदमी को इसकी सजा ज़रूर मिलनी चाहिए. तभी उसके अंतर्मन से आवाज़ आई.... “यह तुम क्या बोल रही हो नंदिनी? सागर ने तुम्हे कब कहा कि वह तुमसे प्रेम करता है? उसने कब अपनी मोहब्बत का इज़हार किया? उसने एक दोस्त की तरह तुमसे बात की और तुमने यह समझा कि वह तुम्हारी सुन्दरता को देख कर तुमसे प्यार कर बैठा है. जिस दिन तुम उससे पहली बार मिली, उस दिन तो उसने तुम पर रत्ती बराबर ध्यान नहीं दिया और घर पर भी उसने तुमसे ख़ुशमिज़ाजी से बात की. मगर तुम उसे खुद में दिलचस्पी लेना समझ बैठीं. अपने सौन्दर्य पर इतना घमंड मत करो नंदिनी की औंधे मुह गिरो. हर लड़का सिर्फ खूबसूरत चेहरा और छरहरी गोरी काया देख कर ही आकर्षित नहीं होता. ख़ूबसूरती शरीर के अन्दर होती, पहचानो तुम उसे और अपने दिल से ये मैल निकाल बाहर करो.” 




अपनी अंतरात्मा से यह सब सुनकर फफक फफक कर रो पढ़ी नंदिनी. उसके हिरनी जैसे सुन्दर नेत्रों से अश्रु धरा बहने लगी. खुद को शीशे में देख कर उसने महसूस किया कि उसके गौर वर्ण मुख पर कालिख पुती हुई थी. अपने दुपट्टे से उसने मुख साफ़ करने का प्रयास किया परन्तु कालिख बढती जा रही थी..... देखते ही देखते वो राख के ढेर में तब्दील होती दिखाई दी. डर से नंदिनी की चीख निकल गयी.






“दादी माँ मैं कल घर वापस चली जाउंगी”, रसोई में दादी माँ का हाथ बंटाते हुए नंदिनी बोली. 
“कल? तू तो परसों जा रही थी. कल क्यों?”, अनभिज्ञ दादी माँ ने जाने का कारण पूछा. 




“बस दादी माँ आपकी गोद में सर रख कर काफी आराम कर लिया. ऐसे कब तक मुश्किलों से दर कर आपके आँचल में छुपती फिरुंगी. अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, जिम्मेदारियों का एहसास हो रहा है मुझे. घर में मम्मी भी अकेली होंगी, उनके साथ भी थोडा वक़्त बिता लूं.” 




“अरे वाह मेरी गुडिया रानी तोह बहुत समझदार हो गयी है”, दादी माँ ने उसे पुचकारते हुए कहा. 
“हाँ दादी माँ ज़िन्दगी के कुछ पहलु आपको बहुत कुछ सिखा आते हैं”, कहते हुए नंदिनी अपनी दादी से लिपट गयी. उसकी आँखें नम थी. दादी माँ को कुछ पता न चले इसलिए वह उन आंसुओ को पी गयी. 



बस में खिड़की से बहार देखते हुए उसने एक बार गाँव की तरफ देखा और फिर आँखें बंद कर ली. इन २-३ दिनों में उसे एक गहन अध्ययन हुआ, जो शायद जीवन पर्यंत नहीं हो पता. छोड़ आये हम वो गलियाँ ... छोड़ आये हम वो गलियाँ... गुनगुनाते हुए नंदिनी अब एक नए दृष्टिकोण को अपना कर काफी हल्का महसूस कर रही थी...........!

#Preeti

लगभग एक साल पहले की बात है मै  एक सफ़र में स्लीपर कोच में सीट न. 72 पर था और  वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ  ...

लगभग एक साल पहले की बात है मै  एक सफ़र में स्लीपर कोच में सीट न. 72 पर था और  वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ 

वाली एक्स्ट्रा सीट पर बैठी थी,……

उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है 
उसके दिल में 
कि कहीं टीसी ने आकर पकड़ लिया तो। 

कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीसी के आने का इंतज़ार 
करती रही। 
शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर 
लेगी। 

देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई 
इसलिए इसमें 
आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र 
भी नहीं करना होगा। 

सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख 
रहा था। 
मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने 
की कि शायद चेहरा 
सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा। 
फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर 
सो गयी। 

और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया। 
लगभग 1 घंटे के बाद टीसी आया और उसे हिलाकर उठाया। 
“कहाँ जाना है बेटा” 
“अंकल अहमदनगर तक जाना है” 
“टिकेट है ?”
“नहीं अंकल …. जनरल का है …. 
लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी” 

“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा” 

“ओह … अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं” 
“ये तो गलत बात है बेटा …. पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी” 
“सॉरी अंकल …. मैं अलगे स्टेशन पर जनरल में 
चली जाउंगी …. मेरे 
पास सच में पैसे नहीं हैं …. कुछ परेशानी आ गयी, इसलिए 
जल्दबाजी में घर से निकल आई … 

और ज्यदा पैसे रखना भूल गयी…. ” बोलते बोलते 
वो लड़की रोने लगी 
टीसी उसे माफ़ किया और 100 रुपये में उसे अहमदनगर तक 
उस डब्बे 
में बैठने की परमिशन दे दी। 

टीसी के जाते ही उसने अपने आँसू पोंछे और इधर-उधर 
देखा कि कहीं 
कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा था। 
थोड़ी देर बाद उसने किसी को फ़ोन लगाया और 
कहा कि उसके 
पास बिलकुल भी पैसे नहीं बचे हैं … अहमदनगर स्टेशन पर 
कोई 
जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे, वरना वो समय पर गाँव 
नहीं पहुँच पायेगी। 


मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी, न जाने क्यूँ 
उसकी मासूमियत 
देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था,
दिल कर रहा था कि उसे पैसे देदूं और कहूँ कि तुम परेशान मत 
हो … 
और रो मत …. लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात 
सोचना थोडा अजीब था। 


उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है 
शायद सुबह से … और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे। 
बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय 
निकालने 
लगे जिससे मैं उसकी मदद कर सकूँ और फ़्लर्ट भी ना कहलाऊं। 
फिर 
मैं एक पेपर पर नोट लिखा,


“बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूँ, जनता हूँ 
कि एक 
अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब 
भी होगा 
और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी, लेकिन तुम्हे इस तरह 
परेशान 
देखकर मुझे बैचेनी हो रही है इसलिए यह 500 रुपये दे 
रहा हूँ ,
तुम्हे कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा एड्रेस भी लिख रहा हूँ 
….. 
जब तुम्हें सही लगे मेरे एड्रेस पर पैसे वापस भेज 
सकती हो …. 
वैसे मैं नहीं चाहूँगा कि तुम वापस करो ….. अजनबी हमसफ़र ”

एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा, और चाय 
वाले 
को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे 
भेजा है। 
नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर 
देखा कि कोई उसकी 
तरह देखता हुआ नज़र आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने 
भेजा। 

लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुँह पर चादर डालकर लेट 
गया था। 
थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे 
पर मुस्कराहट महसूस की। 
लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतज़ार था। 
उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर 
थमा दिया …. 
फिर चादर का कोना हटा- हटा कर हर थोड़ी देर में उसे 
देखकर 
जैसे सांस ले रहा था मैं। 


पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी। 
जब आँख खुली तो वो वहां नहीं थी … 
ट्रेन अहमदनगर स्टेशन पर ही रुकी थी। और उस सीट पर एक 
छोटा सा नोट रखा था ….. 
मैं झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया .. 
और उस पर लिखा था … 


Thank You मेरे अजनबी हमसफ़र …. 


आपका ये अहसान मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगी …. मेरी माँ आज 
मुझे 
छोड़कर चली गयी हैं …. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है 
इसलिए 
आनन – फानन में घर जा रही हूँ। 


आज आपके इन पैसों से मैं 
अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी …. 
उनकी बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें 
ज्यादा देर 
घर में नहीं रखा जा सकता। आजसे मैं आपकी कर्ज़दार हूँ … 
जल्द ही आपके पैसे लौटा दूँगी। 


उस दिन से उसकी वो आँखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने 
की वजह थे …. हर रोज़ पोस्टमैन से पूछता था शायद 
किसी दिन 
उसका कोई ख़त आ जाये …. 
आज 1 साल बाद एक ख़त मिला … 
आपका क़र्ज़ अदा करना चाहती हूँ …. 
लेकिन ख़त के ज़रिये नहीं आपसे मिलकर … 
नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था …. 
और आखिर में लिखा था .. अजनबी हमसफ़र …!

रोज़ सुबह जब घर से ऑफिस को निकलता हूँ, तो कुछ ही दूर चलने पर एक घर आता है। वहाँ वो रहती है। वही जिसके लिए 'असहिष्णु' हो गया...

रोज़ सुबह जब घर से ऑफिस को निकलता हूँ, तो कुछ ही दूर चलने पर एक घर आता है। वहाँ वो रहती है। वही जिसके लिए 'असहिष्णु' हो गया हूँ। रोज़ उस को देख लेने भर से दिन बन जाता है। ऐसा हर किसी की ज़िन्दगी में होता है। मेरी ज़िंदगी में भी हो रहा है।

वो बिहार है, उसके लिए सब कुछ छोड़ सकता हूँ। वो मेरा गाँव है, उसके घर तक होकर आना मेरा कर्तव्य है। वो दसवीं की बोर्ड परीक्षा है, पागल हूँ उसके लिए। वो भक्त नहीं है, मुझसे दूर ही रहती है। वो कांग्रेसी भी नहीं है, जीत लिया है उसने मुझे। वो आम भी नहीं है, सबसे अलग है। पर शायद फिर वो अरहर है, उसको सिर्फ दूर से देखकर ही खुश हो लेता हूँ। वो राम मंदिर है, वो एक दिन जरूर मेरी बन भी जाएगी। वो भूकम्प का झटका है, उसको देख हिल सा जाता हूँ। वो गुजरात मॉडल है, कभी कभी नामुमकिन सा लगता है, जो कि है नहीं।


पर अब ऐसे में 'असहिष्णु' हो जाना सही नहीं। 'सहिष्णुता' ही प्रेम का आधार है। ये 'जबरदस्ती' नहीं हो सकता। गठबंधन के लिए भी जरुरी है विचारों का मिलना। 'आप' ऐसे किसी से कैसे गले मिल सकते हैं, जब तक कोई आप को पसंद न हो।


वो सेमेस्टर एग्जाम है, चुपके से ही सही बालकनी से देख ही लेती है। वो रट्टा नहीं, पूरा कांसेप्ट है। वो सरकारी नौकरी है, सामान्य के लिए नहीं बनी। रोज़ यही सोचता हूँ कि काश, कुछ जगह उसके दिल में मेरे लिए भी आरक्षित हो जाती तो। काश, वो प्रधानमंत्री की तरह चुप रहकर भी, इशारे से ही कुछ कह देती तो।
काश वो, केजरीवाल की तरह, सब बातों को छोड़ मेरी हो जाए तो। काश वो भी कभी मुझसे मिलने के लिए विदेशी दौरे पर आये तो। शायद सब सपना है, वो कल भी कश्मीर थी, पास होकर भी दूर, साथ होकर भी अलग, वो आज भी कश्मीर है, अपने आप में ही उलझी हुई, मेरा ही एक हिस्सा। मेरे दोस्त कहते हैं, उसे भूल जाओ, मैं सिर्फ इतना कह पाता हूँ, वो 'लखीमपुर' थोड़े ही है।

मैं सर झुकाकर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था किउसकीधीमी आवाज सुनाई दी, अभय,खानाखा लो मैंने सर उठा कर उसकीतरफ देखा,मैंने उससे कहा, ...

मैं सर झुकाकर उस वक़्त बिक्री का हिसाब लिख रहा था किउसकीधीमी आवाज सुनाई दी, अभय,खानाखा लो मैंने सर उठा कर उसकीतरफ देखा,मैंने उससे कहा, माया,मै आज डिब्बानहीं लाया हूं ।  दरअसल सच तो यही था कि मेरे घर में उस दिनखानानहींबना था । गरीबी का वो ऐसा दौर था कि बस कुछ पूछो मत । जो मेरे पढने का वक़्त था,उसमे मैं उस मेडिकल शॉप में सेल्समेन का कामकरता था ।


वो सामनेखड़ी थी । मैंने उसे गहरी नज़र से देखा । वो एक साधारण सी साड़ी पहनेहुई थी । जिस पर नीले रंग के फूल बने हुए थे। पता नहीं उस साड़ी को कितनी बार धोयाजा चूका था,उन नीले फूलो का रंग भीउतर सा गया था । उसने मुस्करा कर कहा    मेरे डिब्बे मेंथोडा सा खाना तुम्हारे लिए भी है । चलो खानाखा लो, लंच का समय है ।मैंने हंसकरकहा,  अच्छा ये बताओ कि,तुम्हारे डिब्बे में मेरे लिए कब से खाना आने लगा ।  

उसने कुछ नहीं कहा,बस मुस्करा करअन्दर के कमरे में चली गयी । मैंने भी हिसाब किताबबंद किया और उस कमरे में चल दियाजहाँ उस मेडिकल शॉप के दुसरे बन्दे भी बैठकर दोपहर का खानाखा रहे रहे थे। उसनेडब्बा खोला । कुल मिलाकर उसमे चार रोटी, आलू प्याज कीसब्जी, और एक अचार काटुकड़ा था । उसने डब्बे के कवर में मुझे तीनरोटी और कुछ सब्जी दी, खुद एक रोटी, सब्जी और अचार के साथ खाने लगी । मैंने कहा,   ये क्या माया,एक रोटीसे क्या होंगा, उसनेकहा,  मैं बहुत कम खाती हूँ ,अभय  मैंने ध्यान सेउसे देखा । उसके चेहरे में कोई आकर्षण नहीं था,पर वो अच्छी दिखती थी या हो सकता है कि उस दौर में या उसवक़्त में , ये सिर्फ उस उम्रका आकर्षण था,पर कुछ भी होउसमे कुछ अच्छा लगता था मुझे । डब्बे का खानाखत्म हो गया था और दूकान मालिक की आवाजआ रही थी,चलो सब काम पर लगो,ग्राहक आ रहे है ।


::: २ ::: मेरा नाम अभय हैऔर उस वक़्त, मेरी उम्र करीब२२ साल थी। मैं कामर्स विषय में डिग्री कीपढाई कर रहा था, साथ में ये नौकरी भी । घर के हालात कुछ अच्छे नहीं थे ।इसलिए नौकरी करना जरुरी था । सो सुबह कॉलेज जाता था और दोपहर मेंकॉलेजसे सीधा इसदूकान में आ जाता था,जिसमे मैंसेल्समन कीनौकरी करताथा। करीब रात के ८ बजे तक यहाँ नौकरी करता था और फिर नए सपनोकीउम्मीद में मैं अपने घर चला जाता था। माया को हमारी दूकान में आयेकरीब १ महीनाहो गया था । वो यहाँ पर अकाउंटेंट का काम करती थी ।उसकीउम्र मुझसे ज्यादा ही थी ।रोजवो साइकिल से आती और चुपचापअपना काम करतीऔर चली जाती,कभी भी किसीसे कोई ज्यादा बात नहीं करती थी,दुकानमालिक ने जो कहा उसे सुन लिया।वो एक दुबलीपतली सी लड़कीथी और उसके रख -रखाव से जाहिर था कि वो भी गरीब थी । वो भीका मतलब येथा कि मैं भी गरीब ही था । मैं स्लीपर पहनता था । सिर्फ दो पेंट थी । और चार शर्ट,बस उसी से गुजारा चलता था।इस मेडिकल शॉप मेंमैं सेल्समेन था । मन में कल के लिए सपने थे लेकिन राह नज़र नहीं आती थी । यूँ हीज़िन्दगी गुजर रही थी । उन दिनोंमुझ जैसे गरीब आदमी के सपने और ख्वाइशेभी छोटी हीहोतीथी ।


::: ३ ::: धीरे धीरे माया से मेरी दोस्ती हो गयी । और बीतते हुए समयके साथ ये दोस्ती और गहरी होती चली गयी ।उसको मुझमे कुछ अच्छा लगने लगा और मुझेउसमे कुछ । मुझे लगा कि येप्यार ही था । उस वक़्त प्यार शब्द भी अच्छा लगता था और उसका अहसास भी । खैर,ज़िन्दगी कट रही थी । दोपहर से शामतक काम औरसिर्फ काम,दुनियादारी कीदूसरी बातोके लिए समय नहीं मिलता था । कभी कभीकाम के इन्ही मुश्किल और न ख़त्म होने वाले पलोमें हम एक दुसरे की ओर देख कर मुस्करा लिया करते थे। हाँ वो ज्यादा मुस्कराती नहींथी । पर मुझे अच्छी लगती थी । हम अक्सर बाते कर लेते थे । उसने मुझे बतायाकि वो अपने पिताऔर दो छोटे भाई बहन के साथ रहती थी । कॉमर्स में उसने ग्रेजुएशन किया था और पढाईके तुरंत बाद ही नौकरी करने लगी थी,क्योंकि उसके पिताके पास कोई रोजगार नहीं था और अबसारे परिवार कीजिम्मेदारी उस पर ही थी । बस नौकरीऔर घर,इन दोनों के सिवा उसकीज़िन्दगीका कोई ओर मकसद नहीं था। पर उसकी ज़िन्दगी में शायद अब मैं भी था । गुजरते दिनों के साथ मैंउसके और करीब आने लगा था,मुझे वो अब औरज्यादाअच्छी लगने लगी थी । उसकी मेहनत,उसका भोलापन, उसकीज़िन्दगी कोजीने कीजुस्तुजू और अपने परिवार के लिए उसकीअपनी खुशियों का गला घोंट देना मुझेबहुत अपना सा लगने लगा था। क्या ये प्यार था? आज सोचता हूँ तो उन अहसासों के कई नाम थे,पर मुझे लगता है कि उस वक़्त वो सिर्फ प्यार हीथा।


::: ४ ::: दूकान केमालिक नेदिवाली कीख़ुशी में सबकोउपहार दिए। मैंने धीरे से अपना उपहार भी उसके बैग में डाल दिया,उसने ये देखकर मुझसे कहा, देखो ऐसा न करो,मेरी अपनी खुद्धारी है,सिर्फ वो ही अब मेरे पास बची रह गयी है,उसे तो न छीनो।  मैंने उससे कहा   ऐसी कोई बात नहींहै, बस इस उपहार का मैं क्याकरूँगा?हाँ,अगर ये तुम्हारे काम आया तो मुझे अच्छा लगेंगा। देखो, मना मत करो,इसे रख लो।  उसने बहुत मना किया,पर मैं भी नहीं माना और उसे अपना भी उपहार दे दिया । उपहारलेते समय उसकीआँखे भर आई ।उस दिन मुझे बहुत अच्छा लगा । सारा दिन आकाश में बादलछायेरहे । मन बावरा पक्षी बन उड़ता रहा ।


::: ५ ::: समय बीतता रहा ,मेरी तनख्वाह बढ़ी ।जब नयी तनख्वाह मिली तोमैंनेमाया से कहा कि उसे मैं पार्टी देना चाहता हूँ । वो हंस दी । उसने कहा कि उसनेमेरे लिए एक शर्ट खरीदी है । क्योंकि मेरा जन्मदिन नजदीक आ रहा था,तो दोनों बातो को एक साथ ही सेलिब्रेट करे। मैंनेभी कहा, हां ये ठीक है । और हंसकरअपनी अपनी साइकिल से वापस घर कीओर चल दिये। माया मेरे मोहल्ले से करीब८किलोमीटर दूर रहतीथी । हमारे घरो को अलग अलग करने वाला एक मोड़ था । उस पर आकर हम रुकते थे और अपनीअपनी राह पर चल पडते थे,दुसरे दिन फिर सेमिलने के लिये। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ । हम रुके,माया से मैंने कहा कि कल मिलते है । और कल दोपहर का खानाकहींबाहरखा लेंगे,तुम डब्बा नहीं लाना ।माया ने मुस्करा कर हां कहा । मुझे पता नहीं पर क्यों उसकी भोली सी मुस्कराहट बहुतअच्छी लगती थी । दुसरे दिन माया नहीं आई । मैं पहली बार परेशान हुआ । कुछ भी अच्छा नहीं लग रहाथा ।


उन दिनों फ़ोन की सुविधा भी ज्यादा नहीं थी,क्या हुआ,क्यों नहीं आई?जैसे तमाम सवाल मन में उमडने लगे। शाम को मैंजल्दी ही निकल पड़ाऔर अपनी साइकिल से उसके घर तक गया,उसने मुझे एक बार अपने घर का पता बताया था। घर पहुंचा,वो एक छोटा सा घर था,शायद सिर्फ दो कमरों का । मैंने दरवाजे कीसांकल खड़खड़ायी,दरवाज खुद माया ने ही खोला । मुझे देख कर चौंकसी गयी । मैंने पुछा क्या हुआ,दूकान क्यों नहींआई । उसका चेहरा उदास था। उसने कुछ नहीं कहा,बस अन्दर आने का इशारा किया । घर के भीतर गया तो देखा कि एकचटाई है और उसपर उसके पिताजी और दोनों भाई बहन बैठे हुए है,सभी उदास। उसके पिताजी मुझे जानते थे,वोएक दो बार दूकान पर भी आये हुए थे,तब मुलाक़ात हुई थी ।मैंने उन्हें नमस्ते की और बच्चो सेउनकी पढाई के बारे में पूछा। फिर माया से पूछा कि वो दूकान पर क्यों नहीं आई तोपता चलाकि कल जो तनख्वाह माया को मिली थी वो रास्ते में साइकिल से उसके बैग सहित गिरगयी,जब तक वो उतर कर वापस जाती वो बैग ही गायब होचूका था। उसने शाम को पूरे तीन चक्कर लगाए घर से ऑफिस और ऑफिस से घर,पर बैग को न मिलना था और वो न मिला ।मेरी जेबमें कल कीमिली हुई तनख्वाह का करीब आधा हिस्सा बचा था। वो मैंने निकाल कर उसके हाथमें रख दिया । उसने आँखे भर कर मुझे देखा । मैंने कहा,  कुछ न कहो,बस ले लो । मुझे अच्छा लगेंगा ।   उसके पिताजी नेमुझे देखकर हाथ जोड़ दिए । मैंने उनके हाथो को अपने हाथो में ले लिया और दोनोंबच्चो के सर पर हाथ फेरकर बाहर निकल गया । उस दिन मुझे फिर सेबहुत अच्छा लगा । सारादिनआकाश में बादल छायेरहे । मन बावरा पक्षी बन उड़ता रहा ।


 ::: ६ ::: हम अक्सर यूँ ही मिलते रहे। ऑफिस में,राह में,बस यूँ ही ।कभी कुछ भी कहा नहीं एक दुसरे से,बस मिलते रहे ।और एक दुसरे कोदेखते रहे। कई बारबहुत कुछ कहने को हुआ,पर कह नहीं पाए ।वो मुझे देखती और मैं उसे देखता । बस दिन यूँ ही गुजर जाते । बीच में उसका एकजन्मदिन आया ।,मैंने उसे एकछोटा सा लॉकेट दिया । जिसमे चांदी से अंग्रेजी में  A बना हुआ था । उसने मुझे कहा कि वो ये लॉकेट हमेशा अपने पास रखेंगी । ज़िन्दगीके दिन बीतते गए । मुझे मेरे दोस्त दुसरे शहर में अक्सर बुलाते रहे,ताकि मैं एक बेहतर नौकरी कर सकू ;लेकिन मैं कभी नहीं गया,एक तो मुझे दुसरे शहर में जाकर बसना,इस बात से ही डरलगता था और दूसरा मुझे माया से अलग नहींरहना था।


::: ७ ::: उस दिन शिवरात्री थी । वो शिव कीपूजा करती थी । कुछज्यादाही पूजा करती थी । मैंने उससे पूछा,  क्यों इतनीज्यादा पूजा करती हो शिव की  उसने कहा, शिव भगवान कीपूजाकरने से अच्छा पति मिलता है । बिलकुलतुम्हारे जैसा । ये कहकर वो शर्मा गयी । मैं भी शर्मा गया ।उसने कहा, आज मैं डिब्बे मेंसाबुदाने कीखिचड़ी लायी हूँ । आओ,खाना खा लो ।  हमने लंच में साबुदाने की खिचडी खाई, फिर उसने कहा कि वो शिव मंदिर जा रही है । मुझे भी साथ आनेको कहा । मैं भी चल पड़ा,मैं बहुत ज्यादाभगवान को नहीं मानता था, पर ठीक हैचलो...मंदिरचलो । शिव मंदिर मेंभीड़ थी । वो मंदिर शहर के एक पुराने तालाब के किनारे बना हुआ था। उसने पूजा की औरहम दोनों तालाब के किनारे जाकर बैठ गए। शाम गहरी होती जा रही थी ।
कुछ देर में अँधेरा छा गया । अब कुछ इक्का दुक्का लोग ही रह गए थे,वो मुझसे टिक कर बैठी थी । हम चुपचाप थे। पतानहीं क्या हुआ,मैंने उसका हाथपकड़ा। उसने कुछ नहीं कहा। मुझे कुछ होने लगा । फिर मैंने उसका चेहरा थामा अपनेहाथो में और धीरे से उसके होंठो को छुआ । वो ठन्डे से थे। मैंने तुरंतउसका चेहरादेखा,वो मेरी ओर ही देख रही थी। मैंने कहा कि मुझे शायद उससे प्रेम हो गया है । उसने धीरे से कहा कि वो मुझसेप्रेम करती है । मैंने फिर उसका चेहरा छुआ । वो फिर से ठंडा ही लगा । मैंने सकपकाकर पुछा,  माया तुम्हे कुछ नहीं होता उसने सर उठा कर पुछा,  मतलब? मैंने पूछा कि तुम कुछ रियेक्ट ही नहीं कर रहीहै ।  तुम ऐसी क्यों हो? उसने सर झुका लिया,उसकीआँखे गीली हो गयी । उसने धीरे से कहा,  अभय,मैं ऐसी ही हो गयी हूँ। मेरा जीवन,मेरी गरीबी और मेरे घर के हालात,सबने मिलकर मुझे ऐसा बना दिया है । मेरे मन मेंकिसी के लिए कोई भावनानहीं उमड़ती है  ।मैंने कुछ नहींकहा । बस चुप रह गया । बहुत देर तक हम दोनों में ख़ामोशी रही । फिर पुजारी ने आकरकहा कि मंदिर बंद हो रहा है,अब हम जाए । हमदोनों चुपचाप बाहर कीओर निकले और अपनी अपनी साइकिल उठायी और चल दिए।मैंने उसे उसकेघर तक छोड़ा,हम दोनों में सेकिसी ने कुछ नहीं कहा ।



::: ८ ::: दुसरे दिन माया ने मुझसे कहा,  आज तुमसे कुछबाते करनी है । मैंने कहा, हाँ कहो न । उसने कहा,  वहीं उसी मंदिरमें चलो।  हम दोनों फिर उसी मंदिर में उसी जगह जाकर बैठगए । उसने मेरा हाथ पकड़ा। शाम हो रही थी। सूरज डूब रहा था,तालाब के उस किनारे और हम दोनों बैठे थे इस किनारे। उसने कहा,  देखो अभय । आजमैं तुमसे जो कहने जा रही हूँ सुनकर तुम्हे अच्छा नहीं लगेंगा,पर यही सच है और यही हम दोनों के लिए अच्छाहोंगा । मैं चुप था। उसनेकहा,  मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे प्रेम करते हो और मैं भी तुमसेप्रेम करती हूँ, ये कहकर उसनेमेरा हाथ दबाया । मैं थोडा साआश्वस्त सा हुआ। फिर उसने कहा, लेकिन हम शादी के लिए नहीं बने है । मुझेएकदम से सदमा सा लगा। माया ने कहा,  देखो,तुम्हे अगरलगता है कि हम दोनों बहुत अच्छे पति-पत्नी साबित होंगे तो ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है । शादी के कुछ दिनों या महीनो केबाद तुम अपने प्रेम को खो दोंगे और यही से तुम और मैं अलग अलग होते चले जायेंगे । मैंने एकदम से कहा, ये तुम क्या कहरही हो मायाऔर कैसे कह सकती हो;ये सच नहीं है । माया ने कहा,मैंने तुमसे ज्यादा दुनिया देखीहै अभय।तुम बहुतअच्छे इंसान हो अभय और मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे भीतर का ये इंसान जीते जी ही मरजाए । मैंने कहा, नहीं माया ऐसाकुछ नहीं होंगा । बसकुछ दिनों कीहीबात और है, फिर एक नयी नौकरी के साथ ही सब कुछ ठीक हो जायेंगा । हमशादी कर लेंगे ।  माया ने कहा,  तुम समझ नहीं रहेहो,मैं अपने पिताजी और छोटेभाई बहन को नहीं छोड़ सकती हूँ ।मेरा जीवन उन्ही के लिए है ।मैंने कुछ रुकते हुएकहा, मैं कुछ दिनइन्तजार कर लूँगा । माया ने मेरा चेहरा हाथ में लेकर कहा कि  नहीं अभय,तुम इस इन्तजार को नहीं सह पावोगे और अगर हमनेजल्दबाजी में शादी कर भी ली तो,सब कुछ थोडे हीदिनों में ख़त्म हो जायेंगा। मैं तुम्हे और तुम्हारी अच्छाई को ख़त्म होते नही देख सकती।   मेरी आँखे भीगगयी ।


माया ने कहा,  देखो हम दोनों हमेशा ही अच्छे दोस्त रहेंगे और प्रेम तो हैही, तुम्हे प्रेम में,मेराये शरीर भी चाहिए तो ये भी तुम्हारा ही है। लेकिन मैं तुम्हे कभी भी ख़त्म होते नहीं देख सकती हूँ और अगर हमने शादी कीतोदुनिया कीदुनियादारी तुम्हारे प्रेम को ख़त्म कर देंगी, मैं ये जानती हूँ ।   मैंने एक अनजानी सी आवाज मेंपुछा,  तुम बहुत देर सेमेरे प्रेम और मेरे हीबारे में बात कर रही हो,क्या तुम्हाराप्रेम कभी ख़त्म नहीं होंगा? माया नेमुस्कराकर कहा, नहीं मेरे अभय,मेरा प्रेम तुम्हारे लिए कभी भी खत्म नहींहोंगा । तुम देख लेना । मैं खुद को भी जानती हूँ और तुम्हे भी ।  मैंने गुस्से में कहा,  तुमने ये बातकैसे कह दी कि मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए? माया ने कहा, मैं जानती हूँ कितुम्हे नहीं चाहिए पर अगर तुम्हारे भीतरमौजूद पुरुष को चाहिए तो ये भी तुम्हारा हीहै। मैंने सिर्फ हम दोनों के बीच में मौजूद प्रेम की बात की है।   मुझे बहुत गुस्साआ रहा था,मुझे कुछ समझ भी नहीं आरहा था कि ऐसा क्या करूँ कि कहीं कोई समस्या न रहे । पर गरीबी अपने आप में बहुत बड़ीसमस्या होती है ये मुझे उस दिन ही पता चला ।मुझे अपने आप पर , अपनी गरीबी पर उस दिन पहली बार गुस्सा आया औरबहुत ज्यादा आया और मैं भीतर तक टूट गया ।


 मेरी ज़िन्दगी का पहला सपना ही बिखर रहाथा । मैं गुस्से मेंचिल्ला बैठा,  मुझे कुछ भी नहीं चाहिए,न तुम,न तुम्हारा प्रेमऔर न ही तुम्हारा शरीर ।  और मैं उसेछोड़कर चल दिया , वो मुझे पुकारतीही रह गयी । और मैं चला गया । उस दिन मैंने पहली बार शराब पी,घर में चिल्लाता हुआ घुसा । माँ से कहा,अब मैं शहर चला जाऊँगा,यहाँ नहीं रहना है मुझे, दुनिया ख़राब है, ये ऐसा है,वो वैसा है,पता नहीं क्या क्या बकते हुए मैं नींद के आगोशमें चला गया । दुसरे दिन मैंदूकान नहीं गया । मैंने बहुत सोचा,मुझे कोई समाधान नहीं मिला । गरीबी का कोई तुरंत समाधाननहीं होता , ये बात भी मुझेउसी वक़्त पता चली। मैं तीन दिन दूकान नहीं गया,माया भी नहीं मिलने आई।मैं तीसरे दिन दूकान पहुंचा तो पताचला कि माया ने नौकरी छोड़ दी है। इस बात से मुझे बड़ा धक्का लगा।मैं शाम को उसके घर पहुंचा ।वो घर पर नहीं थी।मैंने उसका इन्तजार करता रहा।उसके पिताजी ने कहा कि उसे कोईदूसरी नौकरी मिल गयी है।ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। थोड़ी ही देर में माया आ गई।मुझेदेखकर उसने ख़ुशी से कहा, चलो अच्छा हुआ तुम आ गए,तुम्हे एक खबर सुनानी थी। मैंने गुस्से मेंकहा, मुझे मालूम है।मैं चलता हूँ। माया ने कहा,   अरे बाबा,रुको तो,तुम तो हमेशा ही गुस्से में रहते हो।थोडा शांत भी हो जावो,अच्छा बैठो। फिर उसने मुझे चिवडा खिलाया और फिर मुझे साथलेकर बाहर आ गयी।उसने बड़े गंभीर स्वर में कहा, देखो अभय अगर मैंवहांरहती तो न तुम काम कर पाते और न ही मैं । हम दोनों का जीवन ही खराब हो जायेंगा।इसलिएमैंनेदूसरी जगह नौकरी कर ली है। हम अब हफ्ते में एक बार मिलेंगे।दोनों का मन ठीक रहेंगाऔर हम दोनों की दोस्ती और प्रेम भी जिंदा रहेंगा । मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा , कुछ नहीं कह पाया . मेरी आँखों में आंसू आ रहेथे । थोड़ी देर तक मैं उसका हाथ थामे बैठा रहा, कुछ देर बाद मैं चुपचाप चला आया !




::: ९ ::: मैं करीब एकहफ्ते दूकान पर नहीं गया।बहुत सोचा,फिर लगा कि मायाकी सोच ठीक है । हमें अभीजीवन को और सुदृढ, कल को और अधिक मजबूत बनाने की ओर ध्यान देना होगा। हो सकता है कल कुछ अधिक बेहतर रास्ता निकल आये।सो पढाई फिर शुरू हो गयी,नौकरी भी चलनेलगी,हफ्ते में एक दिन माया सेमिलता,बहुत सी बाते करता।और इसतरह समय को पंख लगाकर उड़ते हुए देखता रहा। लेकिन,जल्दी ही लगने लगा कि कुछ नया नहीं होंगा,जीवन बस ऐसे ही चलने वाला है। गरीबीके दिन पहाड़ जितनेलम्बे थे,कुछ सूझता नहीं था।कुछदोस्त जो बाहर चले गए थे,वो बार बार बुलारहे थे,माँ भी कह रही थीकि दुसरेशहर में जाकर एक नयी नौकरी ढूँढू जिससे कि घर की आमदनी बढे। बस मेरा मन ही नहींमान रहा था,पता नहीं किस मृग मरिचिकामेंमैं भटक रहा था,अब कभी कभी शराबभी पीने लगा था । माया भी अब पता नहीं क्यों उदास रहने लगी थी। जब भी हम मिलते,वो बार बार मेरा हाथ पकड़कर रो देती थी।मुझेयेसब बाते और पागल बना रही थी। वो मेरे कॉलेज का आखरी साल था। उम्मीद थी कि एक अच्छी नौकरीमिल जायेंगी।रिजल्ट निकला,मैं पास हो गयाथा।अब कुछ नया करने का समय आ गया था।


::: १०     उस दिनशिवरात्रिथी। मुझे मालुम था कि माया आज फिर मंदिर में जायेगी। उसने कल ही कहा था कि आज वोऑफिस नहीं जाएँगी। दोपहर के बाद वो मंदिर में आएँगी। मैंने कहा,  मैं भी उसे मंदिरमें मिलूँगा ।  दोपहर के बाद मैं उसी मंदिर में पहुंचा,जहाँ मैं उसे मिलता था । आज भीड़ थी,मैं मंदिर के कोने वाली एक जगह पर बैठ गया । धीरेधीरे शाम हो रही थी । अचानक माया कीआवाज आई,  लो तुम यहाँ बैठेहो और मैं तुम्हे सारेमंदिर में ढूंढ रही हूँ । मैंने उसकीओर मुड़करकहा   अरे बाबा ,यही तो अपनी जगह है ।  वो पास आकर बैठगयी । उसके साथ उसके दोनों भाई बहन भी आये थे। उन्होंने मुझे नमस्ते की। मैंने भीउन्हें आशीर्वाद दिया । माया ने मुझे पूजा के लिए आने को कहा । मैंने मुस्करा करकहा,  तुम जानती हो,मैं भगवान को नहीं मानता । तुम जाओ और पूजा कर केआ जाओ । उसने कहा,  देखना , एक दिन तुम ,इसी मंदिर में इसी भगवान को हाथ जोडोंगे ।  मैं मुस्करा दिया। थोड़ी देर बाद वो आई और मेरे पास बैठ गयी। उसने अपनी झोली में से एक डब्बा निकाला,उसे मेरी ओर बढाकर कहा, इसमें तुम्हारेलिए लड्डू और चिवडा है ।  मैंने हंसकर कहा  अरे तुम कब तक मेरे लिए डब्बा लाती रहोंगी?  माया ने कहा, जब तक मैं जिंदाहूँ,तब तक तुम्हारे लिए हरशिवरात्री को मैं ये डब्बा लाऊंगी ये वादा रहा । मेरी आँखे भीग गयी । मैंने कुछ नहीं कहा औरडब्बे में रखा खाना बच्चो के साथ बांट कर खाने लगा। माया ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ कर कहा,  अभय एक खबर हैतुम्हे बताना है । मैंने कहा  बताओ ।   माया ने बच्चो को वहां से हटाने की गर्ज सेउन्हें खेलने भेज दिया और उसने मेरा हाथ पकड़ा, बहुत कसकर पकड़ा, मानो उसे छूट जाने का डर हो, फिर उसने मेरी ओरबहुत प्यार से,बहुत गहरी नज़रसे देखते हुये कहा, अभय मेरी शादी तयहो गयी आज ।



 मैं अवाक रह गयाजैसे मुझ पर बिजली आ गिरी हो।मैं अजीब सी आँखों से माया को देखने लगा। माया ने कहादेखो,  हमने सोचा था कि हम एक दुसरे से शादी नहीं करेंगे ताकिहमारा प्रेम बचा रहे । और मुझे ये शादी करनी पड़ी। मैं शादी नहीं करनी चाहती थी,कभी भी नहींऔर किसी से भी नहीं, ये बात तुम जानते हो। लेकिन मुझे परिवार के लिएये शादी करनी पड़ेंगी। मैं चुपचाप था। बहुत अजीब सा अहसास हो रहा था। दिमाग और दिलदोनों हवा में तैरसे रहे थे। जो हमने तय किया थाये ठीक भी था कि हम दोनों एक दुसरे सेशादी नहीं करेंगे ताकि हमारा प्रेम बचा रहे हमेशा ही,लेकिन माया कीशादी किसी और से,ये मैं सहन नहीं कर पा रहा था। मैंने माया से गुस्से मेंपुछा,  ये क्या बात हुई,जब शादी ही करनी थी तो मुझसे कर लेती,मैं तो तैयार ही था? माया ने शांतस्वर में कहा,  अभय,तुम समझ नहीं रहेहो,हम दोनों की सामाजिकपरिस्थिति अलग अलग है ।मैं तो खुश हो जाती तुमसे शादी करके,लेकिन तुम कभी भी खुश नहीं हो पाते ।   मैं भड़क कर बोला  और तुम अब जोशादी कर रही हो,उससे तुम खुश हो?माया ने बहुत शांत स्वर में मेरा हाथ पकड़ करकहा, अभय,मेरे लिए तुमसे बेहतर कोई और पुरुष नहीं । भगवानशिव कीकसम । मैं ये शादी अपनी ख़ुशी के लिए नहीं कर रही हूँ,मैं ये शादी सिर्फ अपने परिवार के लिए कर रही हूँ,जिनकीजिम्मेदारी मुझ पर ही है । तुम मेरे साथकभी भी खुश नहीं रह सकते थे। थोड़ी देर कीख़ुशी रहती और फिर ज़िन्दगी भर काचिडचिडापन ! तुम्हारे लिए हमारा प्रेम सिर्फ बोझ बनकर रह जाता ।और हर बीतते हुएवक़्त के साथ तुम ख़त्म होते जाते। और मैं ये नहीं चाहती थी । मैं चाहती हूँ कितुम जिंदा रहो,न कि सिर्फ शरीरमें बल्कि,ज़िन्दगी के विचारों में,तुम बहुत अच्छे इंसान हो । इस दुनिया को,और बहुत सी माया और दुसरे इंसानों को तुम्हारीजरुरत है । मैं तुम्हे जीते हुए देखना चाहती हूँ ।   पता नहीं माया कि बातो में क्या था,मैं शांत होते गया ।


मैंने धीरे से कहा,  पर माया,हमारा प्यार उसका क्या? माया ने कहा,  प्यार कभी नहींमरता अभय । वो तो हमेशा ही जिंदा रहेंगा । और हमारा प्यार तो कभी भी ख़त्म नहींहोंगा   मैंने धीरे सेपुछा,  तुम्हारे होने वालेपति के बारे में तो बताओ? माया ने कहा, तुम्हे उनके बारे मेंजानकार बहुत अच्छा नहीं लगेंगा,लेकिन जैसा कि मैंने कहा है ये शादी मैं सिर्फअपने परिवार के लिए कर रही हूँ,तुम वादा करो कितुम मुझे रोकोंगे नहीं । मैंने शक से उसे देखते हुए कहा,  क्या बात है माया,अगर तुम खुश न हो तो,क्यों कर रही हो ये शादी? माया ने कहा,  मैंने बहुत पहलेही तुमसेकहा था अभय कि मैं अब मेरी ख़ुशी के लिए नहीं जीती हूँ । मेरे लिए मेरीज़िन्दगी कि सबसे बड़ी ख़ुशी सिर्फ औरसिर्फ तुम ही हो। तुम ही मेरे शिव का सबसेबड़ा प्रसादहो । लेकिन मेरी किस्मत में तुम होकर भी नहीं हो । फिर माया चुप हो गयी । इतनेमें बच्चे आ गए । वो घर चलने कीजिद करने लगे। माया धीरे से उठी,उठते समय मेरे हाथ से उसका हाथ नहीं छूट रहा था। मैं उसके साथबाहर तक आया । मंदिर के बाहर आकर उसने मेरी तरफ देखा। उसकीआँखों में आंसू थे। उसनेकहा,  अभय तुम मेरी शादी में मत आना। तुम सह नहीं पावोगे । पता नहीं मुझे कुछ भीअच्छा नहीं लग रहा था । उसने मेरी तरफ देखा । मेरे होंठो को माया नेअपने दायें हाथसे छुआ और उस हाथ को अपने माथे पर,अपने सर पर,अपनेदिल पर और अंत में अपने होंठो पर लगा दिया। उसने कहा,  अभय,हमेशा ही ऐसेअच्छे इंसान बनकर रहना ।सोचना कि कोई माया थी जिसने तुम्हे ये कहा था । मेरी आँखे फिर भीग गयी ।मैंनेकहा ,   माया , मैं तुम्हे कभीभी भूला नहीं पाऊंगा । उसने एक रिक्शा वाले को हाथ दिखाया । रिक्शा पास आकर रुका ।रिक्शेमें उसने बच्चो को बिठाया और मुझे देखा। जी भर करदेखा । उसका दिल उसकीआँखों मेंसाफ़ नजर आ रहा था। फिर उसने धीरे सेकहा, मेरे होने वालेपतिविधुर है । उन्होंने वादा किया है कि वो मेरे पूरे परिवार कीदेखभाल करेंगे,जब तक सभी है,उन सभी का ख्याल रखेंगे । दोनों भाई बहनों को पढ़ाएंगे ,उनका जीवन बनायेंगे , कभी भी कोई कमी नहीं होने देंगे । सबने पिताजी से औरमुझसेकहा कि ये रिश्ता स्वंय भगवान नेभेजाहै । वरना कौन आजकल किसी के परिवार को पालनेकीबात करता है? मैं भी मान गयी अभय,क्या करु । मेरा जीवन अभिशप्त सा जो है । परमेरे लिए ये भी भगवान का ही प्रसाद है । मैं चलती हूँ,कल से ऑफिस नहीं जाउंगी,अगले हफ्ते शादी है । तुम शादी में न आना । कहकर वो रोने लगी ।



मैं पत्थर का बन गया था,उसके कहे हुएशब्द पारे की तरह मेरे कानो में बरस रहे थे ।मेरी आँखोंसे आंसू बह रहे थे।वोरिक्शे में बैठने के लिए मुड़ी,फिर पता नहींक्या हुआ,मुझसे लिपट गयी,झुक कर मेरे पैर छुए,पैरो कीमिट्टी अपने सर पर लगाई और अपनी रुलाई को दबाते हुए रिक्शेमें बैठ गयी और फिर चली गयी। मुझे लगा कि मेरा जीवन ही जा रहा है। मैं पागल सा होरहा था ।बहुत देर तक मैं वहीं खड़ा उसको रिक्शे में जाते हुये देखता रहा ।


 कुछ देर मेंमंदिर की घंटियाँ बजने लगी , ये मंदिर के बंदहोने का संकेत थी। मैं भीतर गया और भगवान को जी भर कर कोसा,मैंने कहा  इसीलिए मैं तेरीपूजा नहीं करता हूँ। तू है ही नहीं, तू इस दुनिया में अगर होता तो क्या ये होने देता? इसीतरह का अनर्गल प्रलाप करते हुए और पता नहीं क्या क्याबोलते हुए मैं मंदिर में चिल्लाने लगा। पुजारी ने मुझे मंदिर के बाहर निकाल दिया।


मैं रोते कलपते हुएघरआ गया,मां से कहा,मैं ये शहरछोड़कर जा रहा हूँ,दूसरी नौकरी ढूंढता हूँ और फिर तुझे भी ले जाताहूँ,मैंने उसी रात वो शहर छोड़ दिया ।


::: १ ::: बहुत बरस बीत गए । मैं अपने शहर को छोड़कर दुसरे शहरमेंनौकरी करने आगया और वहीं बस भी गया। बीतते समय के साथमेरा भी एक छोटा सा परिवार बनगया । लेकिन फिर भीकभी कभी मुझे , माया की बहुतयादआ जाती,वो कैसी होंगी? उसका जीवन कैसा होंगा?लेकिन मुझे ये तृप्ति थी मन में कि जब मैं उससे अलग हुआ तोवो ज़िन्दगी में बस गयी थी,उसका परिवार बसगया था। मैं अक्सर सोचता था कि क्या वो मेरे लिए एक बेहतर जीवन संगिनी साबित होती?और भी कुछ इसी तरह कीअनेकोंबाते... जिनका अबकोई मतलब नहीं था ।


::: २ ::: फिर अचानक किसीकाम के सिलसिले में मुझे अपने शहर जाना पड़ा। वहां पहुंच कर मेरे मन में सबसे पहलीयाद सिर्फ और सिर्फ माया कीही आयी थी। संयोगवशउस दिन शिवरात्री भी थी।जिस काम केसिलसिले में मुझे जाना पडा था,उसे पूरा करतेकरते मुझे शाम हो गयीथी,रात कीगाडी थीवापसी के लिएऔर मैं एक बार माया से जरूर मिलना चाह रहा था। मेरे कदम खुद ब खुद उसके घरकीतरफ मुड गये,अब वहां पर काफीकुछ बदल चूका था । उसके घर कीजगह अब वहां कोईऔर बिल्डिंग सी बनी हुई थी । मैंनेवहां पर पूछा तो पता चला कि माया केपिताजी गुजर चुके हैं, उनके गुजरने के बाद माया और उसका पति, माया के दोनों भाई बहन के साथ कहीं और रहने चलेगए हैं। कहाँ गए किसी को मालुम नहीं था। मैं निराशहोकर वापस लौट आया,रास्ते में मुझे तालाब के किनारे वाला वहीमंदिरदिखाई दिया ,आँखों में बहुतसी बाते तैर गयी ।


 मेरे पास कुछ समय था,सो मैंने सोचा कि उसी मंदिर में बैठकर समय बितालिया जाए। मैं मंदिर में गयाऔर उसी कोने पर जाकर बैठ गया जहां कभी माया के साथ बैठा करता था। कुछ भीड़ थी,पर मैं वहीं जगह बनाकर बैठ गया और माया के साथ इसजगह बिताये हुये लम्हों को याद करने लगा । थोड़ी देर बाद मंदिर लगभग खाली सा होगया । मेरे दिमाग में बस यही चलता रहा कि माया कैसी होंगी?कहाँ होंगी?...कि तभी एक आवाज आई....  मुझे मालुम था,तुम एक दिन यही मिलोंगे ।   मैं चौंक कर पलटाऔरदेखा तो,माया खड़ी थी । मैं बहुतचकितहुआ और प्रभु कीलीला पर खुश भी[शायद पहली बारप्रभु की महता को स्वीकारा था ]। मैंने माया को गौर से देखा । वो और भी उम्र दराज लग रही थी। उसके साथ उसके छोटे भाईऔर बहन भी थे,जो कि अब काफी बड़े हो गए थे,साथमेंएक छोटा सालड़का भी था । मैंने मुस्कराकर कहा,  आओ बैठो,तुम्हारी ही जगह है,तुम्हारा ही इन्तजारकर रही है । वो पास आकर बैठ गई । मैंने उसकीतरफ हाथ बढ़ाया,उसने मेरा हाथ थामा और मेरी तरफ देखने लगी । मैंनेकहा, कैसी हो माया   उसने कहा, मैं ठीक हूँ औरतुम?   मैं भी ठीक हूँ । मैंने कहा । मैंने फिरउसके भाई बहन कीतरफ इशारा करकेपुछा,  ये दोनों ठीक है ? उसने कहा, हां अब तो अच्छीस्कूल में पढ़ते है । मैं चुप हो गया । 


फिर उसने उस छोटे लड़के की ओर इशारा करकेकहा  ये मेरा बेटा है ।  मेरे मन में एककसक सी उठी,फिर भीमैंने उसके बेटे कीतरफमुस्कराकर हाथ हिलाया । उसने पूछा,  तुम कैसे हो ।शादी कर ली?  मैंने कहा  हां,कर तो ली,पर सच कहूँ तो कभी कभी तुम्हारी बहुत याद आतीहै । और आज यहाँ इस शहर में आना हुआ तो तुम्हारे घर गया,तुम नहीं मिली तो इस मंदिर में आ गया । और देखो तुम मिल भी गयी । यह तोबस भगवान का करिश्मा ही है।  माया ने कहा,अच्छा तो अब तुम भगवान् को भी मानने लग गए हो? मैंने कहा, ऐसी कोई बात नहींहै बस ऐसे ही कह दिया,लेकिन तुमको यहाँदेखकर बहुत ख़ुशी हुई,सचमैंसबसेपहलेतुम्हारेघर गया था लेकिन वहां तुम नही थी। वैसे आजकल रहती कहाँ हो?  माया नेमुस्कराकर कहा, सब बताती हूँ,बाबा,पहले भगवान के दर्शन तो करलूं,नहीं तो मंदिर बंद होजायेंगा। मैंने कहा जरूर,पहले दर्शन कर आओ । मैंने उसे देखा,वो बच्चो के साथ भीतर कीओर चली गयी और मैं तालाब के पानी कोदेखता रहा और माया के बारे में सोचते रहा । 


बस इसी सोच में था कि उसकीआवाज आई ।  लो प्रसाद खा लो,और हाँ...कहते हुये उसने बैठते हुये अपनेझोले से एक डब्बा निकाला,  कुछ लड्डू और चिवडा है तुम्हे पसंदथा न? ये लो,खा लो । मैंने आश्चर्य चकित होकर पुछा,  तुम्हे पता थाकिमैं आज मिलूँगा? उसने कहा,मैं हर शिवरात्रि को तुम्हारे लिए लड्डू औरचिवडे का डब्बा लेकर यहांजरूर आती हूँ,यहीसोचकर कि कभीतो तुम मिलोंगे... और देख लो....आजतुम मिल भी गए ।   मेरे गले में कुछ अटकने लगा। मेरी आँखे भी भरआई । माया ने मेरे आंसू पोंछतेहुए कहा  अरेपागल अब भीरोते हो? मैंने थोड़ी देर बाद पूछा, तुम अपने बारेमें बताओ,कैसी हो? कहाँ हो? माया ने बच्चे को प्रसाद खिलाते हुए कहा,  शादी के कुछ दिनबाद ही बाबूजी नहीं रहे । मैं अपने भाई और बहन को लेकर अपनी ससुराल चली आई । कुछदिनों बाद,मेरा बेटा हुआ । और फिरदो साल पहले ही वो गुजर गए,उन्हें दिल कीबिमारीथी । जो कि बाद में पता चली ।


मेरी आँखों से फिर आंसू बहने लगे,हे भगवानइसे और कितने दुःख देंगा? माया कह रही थी, पर उन्होंने कुछपैसा मेरे लिए रख छोड़ा था, मैंने उसी पैसेसे एक किराने कीदूकान खोल ली है और लोगो को डब्बा पार्सल भी बना कर देती हूँ । कुलमिलाकर,अब ज़िन्दगी कीगाडी ठीकचल रही है । घर भी है,दूकान भी है,डब्बे का काम भी अच्छा चल रहा है,दोनों भाई बहन भी अच्छे से पढ़ रहे है । शिवभगवान कीकृपा है ।  फिर वो चुप हो गयी । मैं भी चुप था,पता नहीं क्या सोच रहा था,मन में विचारों का अजीब सा झंझावात चल रहा था। हम बहुत देर तक चुप रहे ।रात गहरी हो गयी थी । पुजारी ने आकर कहा कि मंदिर बंद होने वाला है। माया ने कहा, अच्छा अब चलतीहूँ,अगली शिवरात्री को मिलना  मैं भी उठ खड़ा हुआ। मैंने यूँ ही पुछा, माया मेरी याद नहीं आती क्या? माया ने मुस्कराकर मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि, ऐसा कोई दिन नहींजब मैं तुम्हे याद नहीं करती हूँ पर तुम नहीं होकर भी मेरे पास ही रहते हो।  मैंने उसकीओर गहरी नज़र से देखा,उसने कहा, मैंने अपने बेटेका नाम अभय ही रखा है । इसलिए,हमेशा,घर में अभय के नाम कीगूँज उठती रहती है .......  
मैं अवाक रह गया। वो कहने लगी,  बेटा अभय,इनके पैर छुओ ।  और जब वो छोटाअभय झुका तो उसके गले में से बाहर की ओर एक लॉकेट लटक गया . मैंने उसे पहचान लिया. वो मेरा माया को दिया हुआ लॉकेट था जिसमे  A  लिखा हुआ था;मेरी आँखे आंसुओ से भर गयी , धुंधला गयी और उसी धुंध में माया एक बार फिर चलीगयी ।


 ::: ३ ::: मेरी आँखों में आंसू थे ।पुजारी फिर मेरे पासआया । वही पुराना पुजारी था , जिसने हमारेप्रेम की शुरुवात और अलग होना देखा था ; उसने मुझे और मैंने उसे पहचान लिया था । उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा ।मैं अकेलाही था,मैंने मंदिर को देखा औरफिर धीरे धीरे मेरे कदम भगवान शिव कीमूर्ती कीओर बडे। और मैंने पहली बार भगवान कोहाथ जोडे। मेरी आँखों में आंसू थे और मैं भगवान को पूज रहा था और कह रहा थाकि वोजो भी करता हैअच्छा ही करता है । और हाँ भगवान है। मैं भागते हुए मंदिर के बाहर आया और दूर अँधेरेमें माया को खोजने की नाकाम कोशिश की ...पर वक़्त और माया दोनों ही रेत की तरह हाथसे निकल गए थे ................! मैं वापस चल पड़ा. आज भी ज़िन्दगी में जब उदास और अकेला सा महसूसकरता हूँ तो बस यही सोचता हूँ कि माया है कहीं ........ और मैं एक आह भरकर अपने आपसे कहता हूँ एक थी माया ............!!!